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Hul Diwas: स्वतंत्रता के पहले विद्रोह की जमीनी पटकथा: भोगनाडीह से उठी हुंकार

जब भारत की मुख्यधारा स्वतंत्रता आंदोलन की पूर्वपीठिका तैयार कर रही थी, उस समय आदिवासी धरती पर स्वाभिमान और आत्मसम्मान की एक ऐसी क्रांति जन्म ले चुकी थी.

June 30, 2025
in झारखंड
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Hul Diwas: स्वतंत्रता के पहले विद्रोह की जमीनी पटकथा: भोगनाडीह से उठी हुंकार
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Hul Diwas: जब भारत की मुख्यधारा स्वतंत्रता आंदोलन की पूर्वपीठिका तैयार कर रही थी, उस समय आदिवासी धरती पर स्वाभिमान और आत्मसम्मान की एक ऐसी क्रांति जन्म ले चुकी थी, जिसने अंग्रेजों के शोषण, ज़मींदारी के अत्याचार और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज बुलंद की.

27 जून 1855 को भोगनाडीह (साहेबगंज, झारखंड) की धरती पर सिदो, कान्हू, चांद और भैरव के नेतृत्व में 60,000 से अधिक संथाल आदिवासियों ने एकजुट होकर वह बिगुल फूंका जिसे आज इतिहास “हूल क्रांति” के नाम से जानता है.

जब अस्मिता की रक्षा के लिए उठे हाथ

हूल, जिसका अर्थ होता है ‘विद्रोह’, केवल राजनीतिक सत्ता पलटने का अभियान नहीं था. यह आंदोलन जल, जंगल, जमीन और जीवनशैली की रक्षा के लिए था—वह जीवनशैली जो पीढ़ियों से आदिवासी परंपराओं और संस्कृति की सांस लेती रही थी.

30 जून 1855 को अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सैकड़ों गांवों के आदिवासियों ने हथियार उठाए. यह था जनआंदोलन का स्वरूप, जिसमें सच्चाई, हिम्मत और बलिदान की गूंज थी.

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हूल दिवस: एक जीवंत प्रेरणा, एक सजीव चेतना

हर वर्ष हूल दिवस को हम श्रद्धा और गर्व के साथ मनाते हैं. यह सिर्फ अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता का पुनर्संवेदन है. झारखंड, बिहार, ओडिशा, बंगाल सहित पूरे देश में यह दिन रैलियों, संगोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जाता है ताकि आज की पीढ़ी को अपने इतिहास से जोड़कर सचेत नागरिक बनाया जा सके.

लेकिन हकीकत यह भी है कि—

हूल क्रांति का इतिहास अब तक शिक्षा पाठ्यक्रम में स्थान नहीं पा सका है.

सिदो-कान्हू जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान नहीं मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था.

आदिवासी अधिकारों और पहचान को लेकर सत्ताएं अब भी नींद में हैं, और इस बहाने आदिवासी समाज सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है.

हूल को भुला देना, इतिहास से गद्दारी है

30 जून 1855 की हूल क्रांति केवल अंग्रेजों के एक और हिंसक नरसंहार का दस्तावेज नहीं है. यह हमारी संवेदनशील और जीवंत सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जिसमें हजारों आदिवासियों ने अपने प्राण देकर आनेवाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष का रास्ता प्रशस्त किया.

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लेकिन अफसोस!

आज भी हम सिदो-कान्हू की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं. हम PESA जैसे जनहितकारी कानूनों को लागू करने में हिचकते हैं. हम आदिवासी जीवन-दर्शन को आधुनिकता की परिभाषाओं में ढालने का प्रयास करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हमें उनके सपनों और संघर्षों को समझने की आवश्यकता है.

अब जरूरी है…

  • हूल दिवस को राष्ट्रीय पर्व की मान्यता मिले.
  • सिदो, कान्हू, चांद और भैरव को राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता दी जाए.
  • आदिवासी अधिकारों को लेकर नीतिगत इच्छाशक्ति दिखाई जाए.
  • स्कूलों और विश्वविद्यालयों में आदिवासी आंदोलनों को पढ़ाया जाए.
  • संविधान सम्मत कानूनों (जैसे PESA, FRA) को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए.

हूल केवल इतिहास नहीं, हमारी चेतना है

हूल दिवस केवल अतीत की बात नहीं करता, यह वर्तमान को जाग्रत करने की पुकार है. यह हमें बताता है कि संघर्ष कोई परछाईं नहीं, बल्कि दिशा है. आइए, इस हूल दिवस पर शब्दों से आगे बढ़ें, और अपने कर्तव्यों, चेतना और प्रतिबद्धता से सिदो-कान्हू के सपनों को साकार करें.

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