झारखंड में जेलों में बंद 53 कैदियों को समय से पहले रिहा किए जाने के प्रस्ताव खारिज कर दिए गए हैं। इनमें के गैंगस्टर फहीम खान, अनिल शर्मा और सुरेंद्र बंगाली समेत कई चर्चित नाम शामिल बताए जा रहे हैं। सरकार ने यह फैसला कैदियों की रिहाई से जुड़े प्रस्तावों की समीक्षा के बाद लिया है। संबंधित मामलों में कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर और दोबारा अपराध होने की आशंका को भी ध्यान में रखा गया।
जानकारी के मुताबिक, 30 जुलाई को हुई राज्य सजा पुनरीक्षण परिषद की बैठक में इन प्रस्तावों पर विचार किया गया था। इसके बाद 53 कैदियों की समयपूर्व रिहाई के प्रस्तावों को मंजूरी नहीं दी गई। हालांकि, प्रत्येक मामले में निर्णय के आधार और संबंधित आदेशों का आधिकारिक दस्तावेजों से मिलान जरूरी है।
फहीम खान की रिहाई का प्रस्ताव भी खारिज
जमशेदपुर की घाघीडीह जेल में बंद फहीम खान का नाम भी इस सूची में शामिल है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परिषद ने उसकी रिहाई के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। निर्णय के पीछे उसके प्रभाव और रिहाई के बाद सामाजिक परिस्थितियों पर पड़ सकने वाले असर को लेकर चिंता जताई गई है।
मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की सरकार की योजना का भी उल्लेख किया गया है। इस संबंध में याचिका की मौजूदा स्थिति और अदालत के आदेश का विवरण आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापित किया जाना चाहिए।
अनिल शर्मा की रिहाई पर भी रोक
हजारीबाग जेल में बंद अनिल शर्मा का नाम भी उन कैदियों में बताया गया है, जिनकी समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव को खारिज किया गया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, जेल में सजा काटने के दौरान एक अन्य कैदी की हत्या के मामले को लेकर उसके बाहर आने पर संभावित खतरे की आशंका जताई गई थी।
खुफिया और प्रशासनिक रिपोर्टों में कथित तौर पर गैंगवार की आशंका का भी उल्लेख है। हालांकि, इन रिपोर्टों के निष्कर्ष और परिषद के आदेश में दर्ज कारणों की पुष्टि आधिकारिक दस्तावेजों से की जानी चाहिए।
सुरेंद्र बंगाली और नरेंद्र सिंह उर्फ पंडित का नाम भी शामिल
फिरौती के लिए महेश पांडेय और उनके भाई की हत्या के मामले में सजा काट रहे सुरेंद्र बंगाली का नाम भी सूची में बताया गया है। इसके अलावा, एक जनप्रतिनिधि की दिनदहाड़े हत्या के मामले से जुड़े नरेंद्र सिंह उर्फ पंडित के समयपूर्व रिहाई प्रस्ताव को भी खारिज किए जाने की जानकारी दी गई है।
इन मामलों में अपराध की प्रकृति, सजा की स्थिति और प्रशासन की रिपोर्ट जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाता है। संबंधित कैदियों की रिहाई के प्रस्ताव खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि उनकी सजा की अवधि बढ़ा दी गई है; इसका मतलब है कि उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत समय से पहले रिहाई की मंजूरी नहीं मिली।
क्या होती है समयपूर्व रिहाई?
समयपूर्व रिहाई यानी Premature Release के तहत किसी सजायाफ्ता कैदी को उसकी पूरी निर्धारित सजा समाप्त होने से पहले रिहा करने के प्रस्ताव पर विचार किया जाता है। इसमें लागू कानून, सजा की अवधि, जेल में आचरण, अपराध की प्रकृति और संबंधित प्रशासनिक व न्यायिक रिपोर्ट जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यह रिहाई अपने आप मिलने वाला अधिकार नहीं है। संबंधित नियमों और पात्रता के आधार पर सक्षम प्राधिकारी या समिति मामले की समीक्षा करती है।
झारखंड में 53 कैदियों के प्रस्ताव खारिज किए जाने के मामले में सरकार का रुख यही बताया जा रहा है कि संभावित सुरक्षा जोखिमों को नजरअंदाज करके रिहाई की मंजूरी नहीं दी जा सकती। हालांकि, प्रत्येक कैदी के मामले में अंतिम निर्णय के सटीक कारण आधिकारिक आदेश से ही स्पष्ट होंगे।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
Expertise: Journalism • Digital Media • Ground Reporting • Content & Social Media • Video Production • News Analysis







