Jharkhand: झारखंड सरकार एक ओर राज्य को नशा मुक्त बनाने के दावे करती है, आदेश जारी होते हैं, सिगरेट और गुटखा पर प्रतिबंध की बात होती है और युवाओं को नशे से बचाने के बड़े अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आती है। कहीं थानों के मालखानों में जब्त नशीला सामान “चूहों की भेंट” चढ़ रहा है, तो कहीं सड़कों पर सिगरेट और गुटखा खुलेआम बिक रहा है। यही विरोधाभास झारखंड के नशा नियंत्रण सिस्टम पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है।
मालखानों में नशा सुरक्षित नहीं, अदालत में केस कमजोर
नशे के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की असली परीक्षा अदालत में होती है। लेकिन झारखंड में बार-बार यह सामने आया है कि पुलिस द्वारा जब्त किए गए नशीले पदार्थ सुरक्षित नहीं रह पाए। राजधानी रांची के नामकुम थाना क्षेत्र में डोडा चूर्ण जब्ती का मामला इसका ताजा उदाहरण है। डोडा जब्त तो किया गया, लेकिन न तो उसे सही तरीके से सील किया गया और न ही सुरक्षित मालखाने में रखा गया। अदालत में यह तथ्य सामने आया कि सैंपल बॉक्स तक चूहों ने कुतर दिए। नतीजा यह हुआ कि सबूत कमजोर पड़े और आरोपी बरी हो गए।
गांजा, शराब और डोडा—तीन मामले, एक ही कहानी
यह कोई अकेला मामला नहीं है। इससे पहले ओरमांझी थाना क्षेत्र में करीब 200 किलो गांजा जब्ती का केस भी अदालत में इसलिए गिर गया, क्योंकि पुलिस ने बताया कि मालखाने में रखा गांजा चूहों द्वारा नष्ट हो चुका है। इसी तरह धनबाद में शराब दुकानों की स्टॉक जांच के दौरान सैकड़ों बोतलें गायब पाई गईं—कुछ खाली, कुछ आधी। जिम्मेदारी तय करने के बजाय सिस्टम फिर उसी बहाने पर आकर ठहर गया—चूहे।
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इन तीनों मामलों में फर्क सिर्फ नशीले पदार्थ का है, कहानी एक ही है—लापरवाही, प्रक्रिया का उल्लंघन और सबूतों की सुरक्षा में विफलता।
कोर्ट का साफ संदेश: दावों से नहीं, सबूतों से चलता है कानून
अदालतों ने ऐसे मामलों में साफ तौर पर कहा है कि कानून जब्ती की कहानी पर नहीं, बल्कि सबूतों की निरंतरता और सुरक्षा पर चलता है। अगर जब्त सामान की चेन टूटती है, सीलिंग नहीं होती और रिकॉर्ड में खामियां होती हैं, तो सबसे मजबूत केस भी टिक नहीं पाता। यही वजह है कि बड़े-बड़े नशा तस्करी मामलों में आरोपी बाहर निकल जाते हैं।
सिगरेट-गुटखा बैन और जमीनी सच्चाई
अब इस तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए। सरकार सिगरेट और गुटखा पर प्रतिबंध लगाने का दावा करती है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। राजधानी रांची से लेकर छोटे कस्बों तक, चौराहों पर, बस स्टैंड के पास, स्कूल-कॉलेज के आसपास और यहां तक कि सरकारी दफ्तरों व थानों के नजदीक भी सिगरेट-गुटखा धड़ल्ले से बिकता नजर आता है। न कोई डर, न कोई झिझक।
बीच-बीच में कुछ दुकानों पर छापेमारी होती है, कुछ पैकेट जब्त किए जाते हैं, लेकिन यह कार्रवाई प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है। कारोबार चलता रहता है, जैसे प्रतिबंध सिर्फ कागजों तक सीमित हो।
दोहरा सिस्टम, एक ही नतीजा
एक तरफ मालखानों में जब्त नशीला सामान सुरक्षित नहीं है, दूसरी तरफ खुले बाजार में प्रतिबंधित तंबाकू उत्पाद बिक रहे हैं। यह दोहरा सिस्टम दिखाता है कि समस्या सिर्फ नशे की नहीं, बल्कि नशा नियंत्रण व्यवस्था की कमजोरी की है। न निगरानी पुख्ता है, न जवाबदेही तय है और न ही आदेशों का सख्ती से पालन हो रहा है।
सवाल जो अब टाले नहीं जा सकते
- मालखानों में CCTV और नियमित ऑडिट क्यों नहीं?
• जब्ती के बाद सख्त सीलिंग और स्टोरेज की व्यवस्था क्यों नहीं?
• सिगरेट-गुटखा बैन की निगरानी कौन कर रहा है?
• हर बार दोष चूहों पर ही क्यों डाल दिया जाता है?
नशा मुक्त का नारा या मजबूत सिस्टम?
झारखंड में नशा मुक्त होने का सपना तभी साकार हो सकता है, जब सिस्टम खुद मजबूत हो। सिर्फ आदेश जारी करने और जब्ती की तस्वीरें जारी करने से काम नहीं चलेगा। जब तक सबूत सुरक्षित नहीं रहेंगे और प्रतिबंध जमीन पर लागू नहीं होंगे, तब तक नशे के खिलाफ लड़ाई सिर्फ कागजों और बयानों तक सीमित रहेगी।
आज हालात यह हैं कि थानों में चूहे नशा खा रहे हैं और सड़कों पर नशे का कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में सवाल नशा मुक्त झारखंड का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जो हर बार खुद को जवाबदेही से बचा लेता है।













