JPSC Scam: झारखंड में सरकारी नौकरी पाने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले हजारों युवाओं के सपनों के साथ क्या हुआ? JPSC की 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा को लेकर CID की जांच में ऐसे दावे सामने आए हैं, जिन्होंने भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच एजेंसी के मुताबिक, तत्कालीन JPSC अध्यक्ष एल. ख्यांगते के लैपटॉप बैग से 15 अभ्यर्थियों की एक गोपनीय पर्ची बरामद हुई थी। हैरानी की बात यह है कि इस पर्ची पर अभ्यर्थियों की पहचान से जुड़ी जानकारी के साथ-साथ उनके नाम के सामने उन पदों का भी उल्लेख था, जिन पर उन्हें नियुक्त किया जाना था।
JPSC Scam: पर्ची में दर्ज 15 अभ्यर्थियों में से 10 परीक्षा में चयनित
CID के इस खुलासे में सबसे अहम बात यह है कि पर्ची में दर्ज 15 अभ्यर्थियों में से 10 ने 11वीं से 13वीं सिविल सेवा परीक्षा पास कर अधिकारी के रूप में चयन हासिल किया। इनमें कश्मीरा हेम्ब्रम, रवि कुमार, महिमा सिंह, विवेक कुमार, जयदीप चौधरी, जनक राज, शालिनी राठी, सेजल सहरावत, विक्की और सरिता बारला के नाम शामिल बताए गए हैं।
बरामद पर्ची में अभ्यर्थियों के नाम, रोल नंबर इंटरव्यू की तारीख दर्ज
जांच एजेंसी के अनुसार, बरामद पर्ची में अभ्यर्थियों के नाम, रोल नंबर, रजिस्ट्रेशन नंबर और इंटरव्यू की तारीख दर्ज थी। इसके अलावा, उनके नाम के आगे हाथ से संबंधित पद भी लिखे गए थे। अगर जांच में सामने आए इन तथ्यों की पुष्टि होती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इंटरव्यू से पहले ही अभ्यर्थियों के पदों का उल्लेख किस आधार पर किया गया था? क्या यह महज संयोग था या चयन प्रक्रिया के भीतर कोई ऐसी व्यवस्था काम कर रही थी, जिसकी जानकारी आम अभ्यर्थियों को नहीं थी?
CID के मुताबिक, सूची में शामिल अभ्यर्थियों के इंटरव्यू विशेष रणनीति के तहत अलग-अलग तारीखों पर तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते के बोर्ड में कराए गए थे। जांच एजेंसी इस व्यवस्था को भी अपनी जांच का अहम हिस्सा मान रही है।
JPSC Scam: PT के दौरान परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज की जांच
जांच का दायरा सिर्फ इंटरव्यू तक सीमित नहीं रहा। CID ने कुछ अभ्यर्थियों के प्रारंभिक परीक्षा यानी PT के दौरान परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज की भी जांच की। एजेंसी के अनुसार, रवि कुमार, कश्मीरा हेम्ब्रम, सेजल सहरावत, शालिनी राठी और विवेक कुमार के फुटेज में संदिग्ध गतिविधियां दिखाई दीं।
CID का दावा है कि इन तथ्यों को अन्य साक्ष्यों के साथ जोड़कर भर्ती प्रक्रिया में संभावित अनियमितताओं की जांच की गई। एजेंसी के आरोपों के मुताबिक, मामला सिर्फ अंतिम चयन तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रारंभिक परीक्षा से लेकर इंटरव्यू तक की प्रक्रिया की भी पड़ताल की जा रही है।
इस मामले में CID ने तत्कालीन अध्यक्ष के आवासीय कार्यालय में कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम करने वाले धर्मेंद्र कुमार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। जांच एजेंसी के अनुसार, धर्मेंद्र कुमार ने बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए TDPL और बिंसिस जैसी एजेंसियों को इम्पैनल कराने में भूमिका निभाई थी।
JPSC Scam: धर्मेंद्र कुमार पर TDPL के निदेशकों पर दबाव बनाने का आरोप
आरोप है कि धर्मेंद्र कुमार ने FRO और ACF परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक कराने तथा अभ्यर्थियों के चयन से जुड़े मामलों में TDPL के निदेशकों पर दबाव बनाया।
CID के अनुसार, तत्कालीन अध्यक्ष के आवासीय कार्यालय से FRO मुख्य परीक्षा में शामिल आठ अभ्यर्थियों के एडमिट कार्ड भी बरामद किए गए थे। जांच एजेंसी इन दस्तावेजों और संबंधित लोगों की भूमिका को भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों की कड़ी के रूप में देख रही है।
वही जांच में 5 जून 2025 की एक नोटशीट का भी उल्लेख किया गया है। CID के मुताबिक, श्वेता गुप्ता की नोटशीट पर TDPL को एल-1 बताते हुए काम सौंपने की अनुशंसा की गई थी। जांच एजेंसी का दावा है कि तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते ने उसी दिन इस पर मंजूरी दे दी थी।
सूची में दर्ज 15 लोगों में से 10 का चयन कैसे हुआ?
अब इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण सवाल सामने हैं। अभ्यर्थियों के नाम और पदों वाली कथित गोपनीय पर्ची आखिर कैसे तैयार हुई? सूची में दर्ज 15 लोगों में से 10 का चयन कैसे हुआ? इंटरव्यू की प्रक्रिया, परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज, बरामद एडमिट कार्ड और एजेंसियों को काम सौंपने से जुड़े दस्तावेजों के बीच क्या संबंध है?
इन सवालों के जवाब झारखंड के उन युवाओं के लिए बेहद अहम हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी मेहनत और योग्यता के दम पर सरकारी नौकरी पाने की उम्मीद रखते हैं। CID के दावों ने JPSC भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल जरूर खड़े किए हैं।

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