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नवरात्रि के पहले दिन क्यों होती है मां शैलपुत्री की पूजा? जानें पौराणिक कथा और महत्व

Maa Shailputri Puja: नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा क्यों होती है? जानें माता सती की पौराणिक कथा, पूजा विधि, मंत्र और धार्मिक महत्व।

अक्टूबर 11, 2026
in धर्म-अध्याय
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नवरात्रि के पहले दिन वृषभ पर विराजमान मां शैलपुत्री का स्वरूप

नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है

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समय: ~9 मिनट•हिंदी बुलेटिन

Maa Shailputri Puja: नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता को शैलपुत्री कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनका संबंध माता सती के पूर्वजन्म और भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा से है। मान्यता है कि मां शैलपुत्री की आराधना करने से भक्तों को साहस, धैर्य और जीवन में स्थिरता की प्रेरणा मिलती है। आइए जानते हैं मां शैलपुत्री की पौराणिक कथा, उनके स्वरूप का महत्व, पूजा विधि और मंत्र।

Table of Contents

Toggle
  • Maa Shailputri Katha: पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण पड़ा शैलपुत्री नाम
    • माता सती और भगवान शिव से जुड़ी है मां शैलपुत्री की कथा
      • मां शैलपुत्री के स्वरूप का क्या है धार्मिक महत्व?
      • नवरात्रि के पहले दिन कैसे करें मां शैलपुत्री की पूजा?
    • मां शैलपुत्री का मंत्र
        • मां शैलपुत्री की पूजा का क्या है महत्व?

Maa Shailputri Katha: पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण पड़ा शैलपुत्री नाम

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। इनमें मां शैलपुत्री को प्रथम स्वरूप माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता ने अपने पूर्वजन्म में राजा दक्ष के घर सती के रूप में जन्म लिया था। भगवान शिव से विवाह के बाद एक घटना के कारण उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद माता ने पर्वतराज हिमालय और माता मैना के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया।

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‘शैलपुत्री’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘शैल’ और ‘पुत्री’ से मिलकर बना है। शैल का अर्थ पर्वत और पुत्री का अर्थ बेटी होता है। इस प्रकार पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। माता पार्वती को भी इसी स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है।

माता सती और भगवान शिव से जुड़ी है मां शैलपुत्री की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष भगवान शिव से प्रसन्न नहीं थे। एक बार उन्होंने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। जब माता सती को इस यज्ञ के बारे में पता चला, तो वे अपने पिता के घर पहुंच गईं। यज्ञ स्थल पर प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक व्यवहार किया। अपने पति का अपमान देखकर माता सती अत्यंत दुखी हुईं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, इस अपमान से व्यथित होकर उन्होंने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।

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माता सती के इस निर्णय से भगवान शिव अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए। इसके बाद माता ने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और दोनों का पुनः विवाह हुआ।

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इसी कारण माता सती और माता पार्वती को देवी के दो जन्मों के रूप में माना जाता है। मां शैलपुत्री की कथा त्याग, तपस्या, श्रद्धा और अटूट संकल्प का संदेश देती है।

मां शैलपुत्री के स्वरूप का क्या है धार्मिक महत्व?

मां शैलपुत्री का स्वरूप शक्ति, धैर्य और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक चित्रों में माता को वृषभ यानी बैल पर सवार दिखाया जाता है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल सुशोभित रहता है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र विराजमान होता है।

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माता के स्वरूप से जुड़े प्रतीकों का धार्मिक महत्व इस प्रकार समझा जाता है:

  • वृषभ यानी बैल: धैर्य, स्थिरता और दृढ़ता का प्रतीक।
  • त्रिशूल: शक्ति और नकारात्मकता का सामना करने की क्षमता का प्रतीक।
  • कमल का फूल: पवित्रता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक।
  • अर्धचंद्र: माता के दिव्य स्वरूप और शिव से उनके संबंध का प्रतीक।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां शैलपुत्री की उपासना भक्तों को कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा देती है।

नवरात्रि के पहले दिन कैसे करें मां शैलपुत्री की पूजा?

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा के साथ देवी आराधना की शुरुआत होती है। इस दिन भक्त सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थल की सफाई करते हैं। इसके बाद दीप जलाकर माता का ध्यान किया जाता है।

मां शैलपुत्री की पूजा में श्रद्धा के साथ फूल, फल और मिठाई अर्पित किए जाते हैं। इसके अलावा भक्त मां के मंत्र का जाप करते हैं और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि तथा मंगल की कामना करते हैं।

धार्मिक परंपराओं में नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना और देवी की विधिपूर्वक पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। पूजा की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

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मां शैलपुत्री का मंत्र

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना के दौरान इस मंत्र का जाप किया जाता है:

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ मंत्र जाप करने से मन को शांति मिलती है और भक्तों को सकारात्मक सोच बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।

मां शैलपुत्री की पूजा का क्या है महत्व?

मां शैलपुत्री की पूजा नवरात्रि की आध्यात्मिक यात्रा का पहला चरण मानी जाती है। उनका स्वरूप भक्तों को जीवन में धैर्य, साहस और दृढ़ संकल्प अपनाने का संदेश देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन माता की आराधना सुख-शांति और सकारात्मकता की कामना के साथ की जाती है।

इस प्रकार मां शैलपुत्री की पौराणिक कथा केवल देवी के जन्म से जुड़ी कहानी नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, तपस्या, आत्मबल और कठिन परिस्थितियों में अपने संकल्प पर अडिग रहने की प्रेरणा भी देती है।

Ritika Singh
Ritika Singh

कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।

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