MMDR एक्ट क्या है
खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, यानी MMDR एक्ट, 1957 में बना कानून है जो देश में खनन गतिविधियों, खनन पट्टों (माइनिंग लीज़) और रॉयल्टी को नियंत्रित करता है। समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे हैं। ताजा संशोधन की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का 2024 का वह फैसला है, जिसमें कोर्ट ने राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स तथा सेस लगाने का अधिकार दिया था। इसी फैसले के आधार पर झारखंड विधानसभा ने 2024 में झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस अधिनियम पारित किया था, जिससे राज्य को बड़ा राजस्व मिलना शुरू हुआ।बिल में नया क्या जोड़ा गया है
नए संशोधन के तहत MMDR एक्ट में सेक्शन 9-D जोड़ा गया है। इस प्रावधान के अनुसार, राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस अथवा किसी अन्य नाम से शुल्क तभी लगा और वसूल सकेंगी, जब वह केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित शर्तों, सीमाओं और प्रतिबंधों के अनुरूप हो। सरल शब्दों में, राज्यों को अब सेस या टैक्स तय करने से पहले केंद्र के निर्धारित दायरे में रहना होगा, जो अब तक काफी हद तक राज्यों के अपने अधिकार क्षेत्र में था। केंद्र सरकार ने विधेयक में इसका उद्देश्य खनिज क्षेत्र में राजकोषीय व्यवस्था को निश्चित, स्थिर और पूर्वानुमेय बनाना बताया है, ताकि देशभर में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सेस दरों की वजह से पैदा होने वाली असमानता खत्म हो सके।झारखंड को कितना नुकसान हो सकता है
झारखंड के 2026-27 के बजट में मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से करीब 14,656 करोड़ रुपये के राजस्व का अनुमान लगाया गया है, जबकि 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह आंकड़ा करीब 13,442 करोड़ रुपये था। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में बताया कि मौजूदा रुझान के अनुसार 2026-27 में इस सेस से करीब 13,215 करोड़ रुपये की आय का अनुमान है। सोरेन के अनुसार, अगर सेक्शन 9-D प्रभावी होता है और राज्य की सेस लगाने की शक्ति सीमित या समाप्त होती है, तो झारखंड को हर साल हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व से वंचित होना पड़ सकता है। मुख्यमंत्री का कहना है कि यह राजस्व राज्य की स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय स्रोत है। गौरतलब है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में कोयला और गैर-कोयला खनिजों से देशभर के राज्यों को कुल मिलाकर करीब 1,14,549 करोड़ रुपये का राजस्व मिला था, जिसमें झारखंड की हिस्सेदारी बड़ी मानी जाती है।हेमंत सोरेन का पक्ष
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस विधेयक को “काला बिल” करार दिया है। उनका कहना है, “खनिज झारखंड का है, जमीन झारखंड की है, तो हमारे हक-अधिकार का फैसला दिल्ली क्यों करेगी।” सोरेन के अनुसार, यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले की भावना के विपरीत है, जिसने राज्यों को यह अधिकार सौंपा था। सीएम ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को लिखे पत्र में इसे राज्य की वित्तीय स्वायत्तता और संघीय ढांचे से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है। उन्होंने चेतावनी भी दी है कि अगर विधेयक वापस नहीं लिया गया, तो झारखंड में इतना बड़ा आंदोलन खड़ा होगा जिसे पूरा देश देखेगा। इस मुद्दे पर विपक्ष तक सीमित न रहते हुए एनडीए में शामिल आजसू पार्टी ने भी आवाज उठाई है। आजसू प्रमुख और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो ने केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी को पत्र लिखकर मांग की है कि नया कानून लागू करने से पहले राज्य के हितों को ध्यान में रखा जाए।केंद्र सरकार और भाजपा का पक्ष
केंद्र सरकार और भाजपा नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। हजारीबाग सांसद मनीष जायसवाल ने कहा कि इस विधेयक से राज्य को कोई नुकसान नहीं होने वाला है, और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आंदोलन की धमकी देकर रांची में चल रहे छात्रों के आंदोलन को कमजोर करना चाहते हैं। झारखंड भाजपा अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि संसद में बिल पास होने के दौरान झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के सांसदों ने सार्थक बहस करने के बजाय हंगामा किया, जिसकी वजह से उन्हें संशोधन के प्रावधानों की सही जानकारी नहीं मिल पाई। केंद्र सरकार समर्थित तर्क के अनुसार, एक समान कर व्यवस्था से खनन क्षेत्र में निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा, खनन परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता बनी रहेगी और इससे नए निवेश तथा रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। पलामू जैसे इलाकों से आई रिपोर्टों में इस बिल को झारखंड के खनिज क्षेत्र के लिए नए अवसर के तौर पर भी देखा जा रहा है।यह विवाद सिर्फ टैक्स का नहीं
इस पूरे मामले में दो अलग-अलग नजरिए साफ नजर आते हैं। राज्य अपने राजस्व और वित्तीय अधिकारों को लेकर चिंतित हैं, जबकि केंद्र समर्थित पक्ष एकरूपता, निवेश और खनिज उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहा है। दोनों तर्कों में अपनी-अपनी जगह वजन है, यही वजह है कि यह विवाद इतना लंबा खिंच रहा है। झारखंड अकेला राज्य नहीं है जिसने इस पर सवाल उठाए हैं। खनिज संपदा से जुड़े ओडिशा जैसे राज्यों में भी इसी तरह की चिंता जताई गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब केवल खनन नियमन तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और भारतीय संघवाद के दायरे की एक बड़ी परीक्षा बन गया है।आगे क्या होगा
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद विधेयक कानून का रूप ले लेगा, जिसके बाद केंद्र सरकार को टैक्स और सेस से जुड़े विस्तृत नियम अधिसूचित करने होंगे। झारखंड सरकार के सामने अभी दो विकल्प हैं — राजनीतिक और संवैधानिक दबाव के जरिए केंद्र से पुनर्विचार की मांग जारी रखना, या कानूनी रास्ता अपनाते हुए न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना। मुख्यमंत्री सोरेन द्वारा दी गई आंदोलन की चेतावनी अगर अमल में आती है, तो आने वाले महीनों में झारखंड की राजनीति में इस मुद्दे का असर और गहराने की संभावना है। फिलहाल राष्ट्रपति की मंजूरी और केंद्र सरकार द्वारा नियमों की अधिसूचना पर सबकी निगाहें टिकी हैं। (यह रिपोर्ट उपलब्ध सार्वजनिक बयानों, सरकारी दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। स्थिति लगातार बदल रही है, ताजा अपडेट के लिए आधिकारिक स्रोत देखें।)
विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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