Ranchi: राजधानी में एयरपोर्ट से रिंग रोड तक प्रस्तावित सड़क परियोजना आठ साल बाद भी अधूरी है। इसकी सबसे बड़ी वजह लगभग 41 एकड़ भूमि का अधिग्रहण न हो पाना है। जिला प्रशासन ने अब 102 रैयतों को अंतिम नोटिस जारी किया है। उन्हें 15 दिनों के भीतर मुआवजा राशि का दावा पेश करने को कहा गया है। प्रशासन का कहना है कि यदि तय समय में दावा नहीं किया गया, तो मुआवजे की राशि सरकारी कोष में जमा कर दी जाएगी।
प्रशासन के मुताबिक, परियोजना के लिए अधिकांश जमीन का अधिग्रहण पूरा हो चुका है। लगभग 80 प्रतिशत रैयतों ने अब तक मुआवजे के लिए जरूरी दस्तावेज भी जमा नहीं किए हैं। करीब 25 प्रतिशत मामलों में पारिवारिक और स्वामित्व संबंधी विवाद भी हैं। यही कारण है कि सड़क निर्माण कार्य पूरी तरह शुरू नहीं हो सका है।
हालांकि, ग्रामीणों और प्रभावित किसानों की चिंताएं सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं हैं। उनका कहना है कि वर्तमान बाजार मूल्य की तुलना में सरकार द्वारा तय किया गया मुआवजा बहुत कम है। कई किसानों का कहना है कि उनकी जमीन के मूल्यांकन पर दी गई राशि में आसपास उसी तरह की जमीन खरीदना संभव नहीं है। कुछ परिवारों का यह भी कहना है कि यह जमीन उनकी पुश्तैनी और आजीविका का एकमात्र सहारा है, इसलिए मात्र आर्थिक मुआवजा उनकी वास्तविक क्षति की भरपाई नहीं कर सकता।
ग्रामीणों का कहना है कि कई मामलों में जमीन के बंटवारे, उत्तराधिकार और पारिवारिक विवाद अभी तक सुलझे नहीं हैं। ऐसे में सभी कानूनी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराना आसान नहीं है। कुछ लोगों का आरोप है कि उन्हें पूरी प्रक्रिया और अपने अधिकारों की जानकारी ठीक से नहीं दी गई।
प्रशासन का कहना है कि यह परियोजना सार्वजनिक हित से जुड़ी है। इसके पूरे होने से एयरपोर्ट से रिंग रोड तक आवागमन आसान होगा। अधिकारियों का कहना है कि परियोजना में देरी से सरकारी धन और विकास दोनों पर असर पड़ रहा है। इसलिए लंबित मामलों का जल्दी निपटारा जरूरी है।
क्या सरकार किसी को जमीन देने के लिए मजबूर कर सकती है?
कानूनी रूप से सरकार सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि का अधिग्रहण कर सकती है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है।
2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार, सरकार को:
* उचित और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी होती है।
* प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा देना होता है।
* पुनर्वास और पुनर्स्थापन की व्यवस्था करनी होती है।
* प्रभावित पक्षों को आपत्ति दर्ज कराने और सुनवाई का मौका देना होता है।
अगर कोई व्यक्ति मुआवजा स्वीकार नहीं करता या दस्तावेज नहीं जमा करता, तो कानून के तहत प्रशासन तय प्रक्रिया पूरी कर मुआवजे की राशि सरकारी खजाने या संबंधित प्राधिकरण के पास जमा कर सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति अपने कानूनी अधिकार खो देता है। यदि मुआवजे की राशि, भूमि के मूल्यांकन या अधिग्रहण प्रक्रिया पर विवाद है, तो प्रभावित व्यक्ति सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
बड़ा सवाल
एयरपोर्ट से रिंग रोड तक सड़क बनाना राजधानी के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ, प्रभावित किसानों का कहना है कि विकास की कीमत उनकी आजीविका और पुश्तैनी जमीन नहीं होनी चाहिए। इसलिए चुनौती सिर्फ अधिग्रहण पूरा करने की नहीं है, बल्कि ऐसा समाधान निकालने की भी है जिसमें विकास और लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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