उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और निष्पक्षता को बढ़ावा देने के लिए लाए गए विवादित नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाने के संकेत दिए हैं। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस) रेगुलेशन्स, 2026 की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय समिति (कमेटी) का गठन किया जा सकता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच को सरकार के इस रुख से अवगत कराया। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 29 जनवरी को इन नियमों पर रोक लगा दी थी और इसकी तटस्थता और दायरे पर सवाल उठाए थे।
इस पूरे मामले से जुड़ी मुख्य बातें
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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने सरकार से सवाल किया था कि वह इन नियमों पर दोबारा विचार क्यों नहीं करती ताकि अगली पीढ़ी के हितों और हर छात्र की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
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कहाँ से शुरू हुआ मामला: ये नियम 2019 में सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई उस याचिका से उपजे हैं, जिसे रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ मजबूत सुरक्षा तंत्र की मांग करते हुए दाखिल किया था।
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राजनीतिक और सामाजिक विरोध: 13 जनवरी 2026 को इन नियमों की अधिसूचना जारी होने के बाद से ही ये बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन गए थे। सामान्य वर्ग के समूहों के साथ-साथ दलित और ओबीसी समुदायों के कुछ हिस्सों ने भी इनमें शामिल परिभाषाओं और बहिष्करण को लेकर कड़ी आपत्ति जताई थी।
अदालत की जांच के दायरे में आने वाले मुख्य मुद्दे
सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों की वैधता को लेकर कई तीखे सवाल उठाए थे:
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जातिगत भेदभाव की परिभाषा: नियम 3(1)(c) के तहत विशेष सुरक्षा का दायरा केवल अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जातियों (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित रखने पर सवाल उठे। आलोचकों का कहना था कि इससे सामान्य वर्ग के छात्र और फैकल्टी इससे बाहर हो जाते हैं।
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वर्गीकरण और उप-वर्गीकरण: अदालत ने यह भी जांचने की बात कही कि क्या ये नियम अत्यंत पिछड़ी जातियों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करते हैं, और क्या छात्रावासों या कक्षाओं में “अलगाव” (segregation) जैसे शब्दों का प्रयोग संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
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रैगिंग को शामिल न करना: अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई थी कि भेदभाव के एक रूप के रूप में “रैगिंग” को इन नियमों में स्पष्ट रूप से क्यों छोड़ दिया गया है।
आगे क्या रहेगा नजर
उम्मीद की जा रही है कि केंद्र सरकार जल्द ही इस समीक्षा समिति के गठन और उसकी रूपरेखा (Terms of Reference) की औपचारिक घोषणा करेगी, जो देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और समावेशिता के बीच संतुलन बिठाने के लिए इन सभी प्रावधानों का पुनर्मूल्यांकन करेगी।

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