विश्व आदिवासी दिवसः इस साल आदिवासी महोत्सव में खामोशी है, क्योंकि आदिवासी राजनीति के क्षितिज दिशोम गुरू शिबू सोरेन के निधन के बाद पूरे राज्य में सन्नाटा है। झारखंड की परिकल्पना को साकार करने वाले गुरूजी का निधन देश के लिए अपूरणीय क्षति है। नेमरा में जन्म लेकर सबके दिलों पर राज करने वाले शिबू सोरेन पुनः उसी नेमरा की माटी में विलीन हो गए। इसलिए इस बार आदिवासी महोत्सव में उल्लास नहीं, बल्कि श्रद्धांजलि का भाव है।
सभ्यता और संस्कृति का संरक्षण – आदिवासी समाज का योगदान
21वीं सदी में विकास की चर्चा भले तेज हो, लेकिन मानव सभ्यताओं को जीवित रखने का असली श्रेय आदिवासी समाज को जाता है। भौतिकतावादी युग में अनूठी परंपराओं और संस्कृति के साथ सामंजस्य बनाए रखना एक चुनौती है। खासकर उदारीकरण के दौर में, जहां खनिज संपदा के लोभ में सांस्कृतिक विरासत पर खतरे मंडराने लगते हैं। इसके बावजूद आदिवासी समाज अपनी समृद्ध परंपराओं और जीवनशैली को संरक्षित करने में सफल रहा है।
स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी संघर्ष की गाथाएं
झारखंड के आदिवासी समाज की गाथाएं केवल किसी दिवस की औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत हैं। 1831 का कोल विद्रोह, संताल हुल, और बिरसा मुंडा का उलगुलान इस बात के प्रमाण हैं कि संघर्ष आदिवासी समाज की रगों में बहता है। बिरसा मुंडा ने युवावस्था में ही डुम्बारी पहाड़ पर अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी।
यूएनओ और विश्व आदिवासी दिवस
संयुक्त राष्ट्र ने 1993 में आदिवासी अधिकार घोषणा पत्र को मान्यता दी और 1994 से 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य उनकी परंपराओं, भाषा, संस्कृति और स्वशासन की रक्षा करना था।
जल, जंगल, जमीन – अस्तित्व की जड़ें
झारखंड में 29.2% क्षेत्र वनों से आच्छादित है और खनिज संपदा के मामले में यह विश्व में अग्रणी है। जल-जंगल-जमीन से आदिवासी समाज का गहरा जुड़ाव है और इन्हें बचाने के लिए उनका दर्शन आज भी सबसे प्रासंगिक है।
खेल, कला और साहित्य में योगदान
सीमित संसाधनों के बावजूद आदिवासी समाज ने खेल के क्षेत्र में देश का नाम रोशन किया है। हेलेन सोय, अलमा गुड़िया, असुंता लकड़ा, सुमराई टेटे जैसे खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्धियां हासिल की हैं। साहित्य और कला में डॉ. रामदयाल मुंडा, सिमोन उरांव और मुकुंद नायक जैसे नाम अमिट हैं।
भविष्य की राह – विकास और संरक्षण
झारखंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए शहीदों के गांवों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। भोगनाडीह और उलीहातू से इसकी शुरुआत हो सकती है। आदिवासी समाज का विकास उनकी जरूरतों और आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए, ताकि झारखंड देश का सबसे संपन्न और समावेशी राज्य बन सके।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
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