Ranchi : सीयूजे (CUJ) के प्रोफेसर-शोधार्थी की टीम, डॉ नितेश भाटिया एवं डॉ कनाया महंती, ने झारखंड के विश्व प्रसिद्ध मुड़मा मेला से को-प्रेन्यूर (सह-उद्यमी) की वैश्विक अवधारणा को पहली बार पूरे स्वरूप में परिभाषित करके स्थापित किया है। इस परिभाषा को एक पूरे स्वरूप में व्यवसाय प्रबंधन शिक्षा के क्षेत्र में पूरे विश्व में पढ़ाया जाएगा। इस परिभाषा को एक मानक के तौर पर पूरे शिक्षा क्षेत्र में अपनाया गया है।
शोधार्थी द्वय ने ‘सह-उद्यमिता’ शब्द को ना सिर्फ पूर्ण स्वरूप में सफलतापूर्वक परिभाषित किया है, बल्कि झारखंड राज्य के समृद्ध स्वदेशी संस्कृतियों और ग्रामीण उद्यमिता के साथ अपनी गहरी जड़ें भी सफलतापूर्वक साबित की हैं। उनके लेख में कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में सफलतापूर्वक व्यावसायिक उद्यम चलाने वाले एक जोड़े (पति और पत्नी) द्वारा सामना की जाने वाली विभिन्न भूमिकाओं और चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है। लैंगिक भूमिकाएँ, जीवनसाथी का सहयोग और संबंधों की संतुष्टि, कार्य-जीवन संतुलन, व्यावसायिक प्रतिबद्धता जैसे प्रमुख पहलुओं की पड़ताल के साथ गहन डेटा संग्रह के माध्यम से, प्रेरणा, नेतृत्व और निर्णय लेने और अंतर्संबंधित दुनिया में श्रम और जिम्मेदारियों के विभाजन ने वैश्विक अनुसंधान मंच पर सह-उद्यमियों की औपचारिक परिभाषा को सामने ला दिया है। इसकी वृहद व्याख्या झारखंड में हर साल आयोजित होने वाली
मुड़मा मेला के बाजार को विश्लेषित करके संभव हो पाया है। झारखंड में रांची के पास मुड़मा गांव में सदियों पुराना 02 दिवसीय पारंपरिक आदिवासी मेला आयोजित होता है जिसे मुड़मा मेला कहते हैं। यह मेला, झारखंड की दो प्रमुख आदिवासी जनजातियों – “ओरांव” और “मुंडा” के बीच मित्रता और आतिथ्य के उत्सव का स्मरण कराता है।
अध्ययन में सामाजिक उद्यमियों के साथ अर्ध-संरचित साक्षात्कारों का उपयोग करते हुए, गुणात्मक दृष्टिकोण के साथ एक खोजपूर्ण शोध डिज़ाइन अपनाया गया। भाग लेने वाले सह-उद्यमी और ग्रामीण महिला उद्यमी स्वदेशी तकनीकों के संरक्षक हैं, जिनका उपयोग वे हस्तशिल्प उत्पादों, कृषि और शिकार उपकरणों को बनाने में करते हैं।
इस अवधारणा को एक पूरे स्वरूप में संपूर्ण विश्व में पहली बार व्याख्यायित किया गया है जिसे व्यवसाय प्रबंधन के क्षेत्र में पढ़ाया जाएगा
पश्चिमी शोध में सह- उद्यमी की अवधारणा 1976 से आती है और उसके बाद सह-उद्यमियों पर बहुत सीमित शोध हुआ, हालांकि पारंपरिक ग्रामीण झारखंड में यह कई सदी से भी अधिक समय से देखा जा रहा है। जिसे सीयूजे के शोधार्थी द्वय ने ग्रामीण झारखंड और मुड़मा जतरा पर किए गए शोध के माध्यम से परिलक्षित किया है। अध्ययन के निहितार्थ से सह-उद्यमियों को बेहतर पारस्परिक संबंध, बेहतर कार्य-जीवन संतुलन, लिंग भूमिका परिवर्तन का अवसर, उत्तराधिकार नियोजन रणनीति विकास, वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण/वित्त पोषण की नई नीतियों की गुंजाइश, साथ ही दीर्घकालिक व्यापार वृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है।
डॉ. भाटिया ने बताया कि उनके शोध के अनुसार, मुड़मा जतरा में विभिन्न राज्यों और पड़ोसी देशों से आगंतुकों और उद्यमियों के रूप में गैर-आदिवासी और अन्य आदिवासी समुदायों का महत्वपूर्ण आगमन होता है। पाहनों (पुजारियों) द्वारा पारंपरिक अनुष्ठानों की समृद्ध प्रदर्शनी, साथ ही ग्रामीण सह-उद्यमियों और महिला उद्यमियों द्वारा स्वदेशी तकनीकों का उपयोग करके बर्तन, शिकार के हथियार, कृषि उपकरण और सौंदर्य प्रसाधन जैसी हस्तनिर्मित वस्तुएं इस सामाजिक – सांस्कृतिक कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण हैं। ग्रामीण सह-उद्यमियों और ग्रामीण महिला उद्यमियों से एकत्र किए गए प्रत्यक्ष आंकड़ों को एकीकृत करके, और सांख्यिकीय तकनीकों और एनवीवो (12) जैसे सॉफ्टवेयर का उपयोग करके, वे झारखंड के ग्रामीण सह-उद्यमियों और महिला उद्यमियों की सफलता को उनके गुणवत्तापूर्ण उत्पादों, वंशानुगत कौशल, आत्मनिर्भरता और ग्राहक संतुष्टि के रूप में उजागर करने में सफल रहे। उन्होंने ग्रामीण महिला उद्यमियों, सह-उद्यमियों के सफल केस स्टडीज़ के साथ-साथ झारखंड राज्य आजीविका संवर्धन सोसाइटी (झारखंड सरकार के तहत जेएसएलपीएस) की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में भी पूछताछ की और उसे एक अन्य लेख में प्रकाशित किया है।
महांती (डॉ भाटिया की शोधार्थी) अभी क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में सहायक प्राध्यापक हैं। इस विषय पर इन दोनों के संयुक्त प्रकाशित शोध लेख, इंटरनेशनल एंटरप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट जर्नल (स्प्रिंगर), एसएजेएम (एएमदीआईएसए, AMDISA) और जर्नल ऑफ रूरल डेवलपमेंट (एनआईआरडी, भारत सरकार) जैसे शीर्ष पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। यह स्कोपस/डब्लूओएस/एबीडीसी जैसे शीर्ष सूचकांकों के अंतर्गत सूचीबद्ध जर्नलों में आते हैं। गौरतलब है कि डॉ. भाटिया हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय टीम का हिस्सा रहे हैं, जिसने जर्नल ऑफ बिहेवियरल एडिक्शन में प्रकाशित एक इंटरनेशनल वर्क एडिक्शन स्केल (आईडब्ल्यूएएस) विकसित किया है, जिसमें दुनिया भर के छह महाद्वीपों और 85 संस्कृतियों के 31,352 कर्मचारियों के डेटा पर शोध किया गया है।













