Lohardaga: जिले के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र चूल्हापानी में सोमवार को गंगा दशहरा के अवसर पर आयोजित “देवनद-दामोदर महोत्सव-2026” में झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार ने नदियों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को लेकर बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि हमारी आस्था, संस्कृति और जीवन का आधार हैं। दामोदर नदी को झारखंड की जीवनरेखा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसने राज्य के जनजीवन, कृषि, उद्योग और सांस्कृतिक परंपराओं को समृद्ध किया है।
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नदियों का संरक्षण मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य
राज्यपाल ने कहा कि वर्तमान समय में दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जल संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में नदियों का संरक्षण मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा कि जलस्रोत सुरक्षित रहेंगे, तभी विकास और जीवन का संतुलन बना रहेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नदियों की स्वच्छता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामूहिक दायित्व है। उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई नमामि गंगे और लाइफस्टाइल फॉर इन्वायरमेंट (LiFE) जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति संरक्षण को जन-संकल्प का रूप दिया जा रहा है। राज्यपाल ने युवाओं और सामाजिक संगठनों से अपील की कि वे पर्यावरण संरक्षण को जन-आंदोलन बनाएं।
दामोदर 95 प्रतिशत से अधिक स्वच्छ. सरयू राय
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे दामोदर बचाओ आंदोलन के प्रणेता और जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि वर्ष 2004 में उन्होंने देखा था कि दामोदर नदी में पावर प्लांट, सीसीएल और बीसीसीएल से राख, छाई और तेल बहाया जा रहा था। उस समय दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में दामोदर का नाम शामिल था। इसके बाद गंगा दशहरा के दिन चूल्हापानी से कोलकाता तक अध्ययन और जन-जागरूकता यात्रा निकाली गई। लगातार प्रयासों और केंद्र सरकार के सहयोग से आज दामोदर 95 प्रतिशत से अधिक स्वच्छ हो चुकी है। उन्होंने बताया कि उस समय पटना साइंस कॉलेज के वैज्ञानिकों और एक चलंत प्रयोगशाला की मदद से नदी के पानी की जांच की गई थी। जर्मन वैज्ञानिक नेस्मन हैस्को ने भी अभियान में सहयोग दिया था।
युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण ने कहा कि दामोदर के उद्गम स्थल को स्थानीय लोग देवनद कहते हैं, जबकि चंदवा के पास इसका नाम दामोदर हो जाता है। इसी कारण महोत्सव का नाम देवनद-दामोदर महोत्सव रखा गया। उन्होंने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य नदी संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना है।
राज्यपाल ने चूल्हापानी की प्राकृतिक सुंदरता की सराहना
विशेष बात यह रही कि राज्यपाल संतोष गंगवार चूल्हापानी पहुंचने वाले पहले राज्यपाल बने। यह इलाका कभी उग्रवादियों का गढ़ माना जाता था। राज्यपाल 16 किलोमीटर की कठिन पहाड़ी यात्रा कर घने साल जंगलों से होते हुए वहां पहुंचे। उन्होंने पाकड़ के पेड़ से जल रिसाव का दृश्य देखा और पूजा-अर्चना, हवन तथा आरती में भाग लिया। राज्यपाल ने चूल्हापानी की प्राकृतिक सुंदरता की सराहना करते हुए यहां पर्यावरण अनुकूल पर्यटन विकसित करने पर सहमति जताई। स्थानीय लोगों ने इस क्षेत्र को बेहतर पर्यटन श्रेणी में शामिल करने की मांग भी उठाई। समारोह में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण और प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे।








