आखिर भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी लक्ष्मी को रथ यात्रा में साथ क्यों नहीं ले जाते?
हर साल जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन करते हैं। लेकिन एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है-जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन और भाई के साथ गुंडीचा मंदिर जाते हैं, तो माता लक्ष्मी उनके साथ क्यों नहीं जातीं?
इस सवाल का जवाब पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपरा और उड़िया लोककथाओं में मिलता है, जिसे ‘हेरा पंचमी’ के नाम से जाना जाता है।
क्या है हेरा पंचमी की कथा?
लोकप्रिय मंदिर परंपरा के अनुसार, रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडीचा मंदिर जाते हैं। माता लक्ष्मी श्रीमंदिर में ही रहती हैं।
कुछ दिन बीतने के बाद जब भगवान जगन्नाथ वापस नहीं लौटते, तो माता लक्ष्मी नाराज़ हो जाती हैं। इसके बाद रथ यात्रा के पाँचवें दिन, जिसे हेरा पंचमी कहा जाता है, माता लक्ष्मी प्रतीकात्मक रूप से गुंडीचा मंदिर तक जाती हैं।
वहाँ भगवान जगन्नाथ से उनके देर से लौटने का कारण पूछा जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, नाराज़गी के प्रतीक के रूप में माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के रथ के एक हिस्से को हल्का-सा क्षतिग्रस्त करने का सांकेतिक अनुष्ठान करती हैं और फिर वापस श्रीमंदिर लौट जाती हैं।
भगवान जगन्नाथ को क्यों मांगनी पड़ती है माफी?
लोककथा के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ वापस श्रीमंदिर लौटते हैं, तब माता लक्ष्मी उनसे रुष्ट रहती हैं। भगवान जगन्नाथ उन्हें मनाने के लिए विशेष भोग और उपहार अर्पित करते हैं। इसके बाद ही माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भगवान के मंदिर में पुनः प्रवेश का मार्ग खुलता है।
यह प्रसंग भगवान और देवी के रिश्ते को एक मानवीय भाव देता है, जिसमें प्रेम, रूठना और मनाना जैसे भाव दिखाई देते हैं। यही कारण है कि यह कथा श्रद्धालुओं के बीच बेहद लोकप्रिय है।
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क्या यह कथा शास्त्रों में मिलती है?
इस कहानी को वेदों या प्रमुख पुराणों का प्रत्यक्ष प्रसंग नहीं माना जाता। यह मुख्य रूप से पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपराओं, सेवायतों की मौखिक परंपरा और उड़िया लोककथाओं में प्रचलित है।
हालांकि, हेरा पंचमी का अनुष्ठान आज भी हर वर्ष रथ यात्रा के दौरान पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ मनाया जाता है। इसलिए यह धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है।
हेरा पंचमी केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि रिश्तों में प्रेम, सम्मान और मनुहार का महत्व हमेशा बना रहता है। भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी की यह लोकप्रिय परंपरा रथ यात्रा को और भी भावनात्मक और विशेष बना देती है।
नोट: इस लेख में वर्णित कथा पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपरा और उड़िया लोककथाओं पर आधारित है। इसे शास्त्रों का प्रत्यक्ष प्रसंग नहीं माना जाता, जबकि हेरा पंचमी का वार्षिक अनुष्ठान वास्तविक और प्रचलित धार्मिक परंपरा है।









