ओडिशा के पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर में स्थापित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां भारत के अन्य मंदिरों की मूर्तियों से बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं। इन मूर्तियों में पारंपरिक मानव आकृति की तरह पूरे हाथ और पैर नहीं हैं। इन्हें देखकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में सवाल उठता है-आखिर भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां अधूरी क्यों हैं?
इस प्रश्न का उत्तर पुरी मंदिर की परंपरा, क्षेत्रीय धार्मिक ग्रंथों और लोकप्रिय लोककथाओं में मिलता है।
क्या है राजा इंद्रद्युम्न और विश्वकर्मा की कथा?
लोकप्रिय परंपरा के अनुसार, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न भगवान नीलमाधव के दर्शन करना चाहते थे। बाद में उन्हें भगवान के आदेश से पुरी में मंदिर बनवाने और नई मूर्तियां स्थापित करने का निर्देश मिला।
कहा जाता है कि देव शिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के वेश में आए और उन्होंने मूर्तियां बनाने की जिम्मेदारी स्वीकार की। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी-
जब तक मूर्तियां पूरी न बन जाएं, तब तक कोई भी कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।
राजा इंद्रद्युम्न ने यह शर्त स्वीकार कर ली।
बीच में क्यों खोला गया दरवाजा?
कई दिनों तक कमरे से कोई आवाज नहीं आई। रानी और राजपरिवार को चिंता होने लगी कि भीतर सब ठीक है या नहीं।
लोकप्रिय कथा के अनुसार, रानी की जिज्ञासा और चिंता के कारण दरवाजा समय से पहले खोल दिया गया।
जैसे ही दरवाजा खुला, विश्वकर्मा वहां से अंतर्ध्यान हो गए। कमरे में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां थीं, लेकिन उनके हाथ-पैर पूरी तरह बने नहीं थे।
फिर इन्हीं अधूरी मूर्तियों की पूजा क्यों शुरू हुई?
कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न को इस बात का बहुत दुःख हुआ। तभी उन्हें यह दिव्य संकेत मिला कि यही भगवान की इच्छा है और इसी स्वरूप में उनकी पूजा की जाए।
तब से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पूजा उसी अद्वितीय रूप में होती आ रही है।
आज यही स्वरूप जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है।
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क्या इसका कोई आध्यात्मिक अर्थ भी माना जाता है?
कई विद्वान और भक्त इस स्वरूप का प्रतीकात्मक अर्थ भी बताते हैं।
- भगवान किसी एक रूप या सीमा में बंधे नहीं हैं।
- उनका प्रेम सभी के लिए समान है।
- अधूरा दिखाई देने वाला यह स्वरूप ईश्वर की अनंतता और सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है।
- यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ को “सबके भगवान” भी कहा जाता है।
यह व्याख्या धार्मिक परंपराओं और विद्वानों की अलग-अलग मान्यताओं पर आधारित है।
मूर्तियां किस लकड़ी से बनती हैं?
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की मूर्तियां नीम (दारु) की पवित्र लकड़ी से बनाई जाती हैं।
विशेष वर्षों में आयोजित नवकलेवर अनुष्ठान के दौरान पुरानी मूर्तियों की जगह नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। इसके लिए विशेष धार्मिक नियमों के अनुसार पवित्र नीम वृक्षों का चयन किया जाता है।
राजा इंद्रद्युम्न और विश्वकर्मा की यह कथा पुरी मंदिर की परंपराओं, उड़िया धार्मिक साहित्य तथा स्कंद पुराण के उत्कल/उड़िया परंपरा से जुड़े विवरणों में विभिन्न रूपों में मिलती है। अलग-अलग स्रोतों में घटनाओं के विवरण में कुछ अंतर हो सकता है।
हालांकि, भगवान जगन्नाथ की वर्तमान मूर्तियों का यही स्वरूप सदियों से पुरी मंदिर की आधिकारिक पूजा परंपरा का हिस्सा है।
नोट: इस लेख में वर्णित कथा मुख्यतः पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपराओं और क्षेत्रीय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में इसके विवरण अलग-अलग मिल सकते हैं।









