Independence Day 2026: तिलका मांझी: वह नाम जो “पहला शहीद” कहलाने का हकदार था
इतिहास की मुख्यधारा में जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, वह है तिलका मांझी की कहानी। 1750 में जन्मे तिलका मांझी को कई इतिहासकार भारतीय स्वाधीनता संग्राम का पहला शहीद मानते हैं — यानी 1857 से भी करीब सात दशक पहले। पहाड़िया समुदाय के इस योद्धा ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लंबा संघर्ष छेड़ा और बाद में संतालों के प्रसिद्ध विद्रोह का नेतृत्व भी किया। 1785 में गिरफ्तार किए जाने के बाद उन्हें भागलपुर में फांसी दे दी गई। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर “प्रथम शहीद” के तौर पर जो पहचान उन्हें मिलनी चाहिए थी, वह आज भी अधूरी है।Independence Day 2026: बुधु भगत और “लरका विद्रोह”: 1857 से पहले का संग्राम
1857 के गदर से पहले ही छोटानागपुर की धरती अंग्रेजों के खिलाफ धधक चुकी थी। इसका श्रेय जाता है बुधु भगत को, जिन्होंने 1831-32 में कोल विद्रोह और “लरका विद्रोह” का नेतृत्व किया। तीर-धनुष और कुल्हाड़ी जैसे परंपरागत हथियारों से लैस उनकी सेना ने अंग्रेजी बंदूकों का डटकर मुकाबला किया। यह आंदोलन सिर्फ मुंडा जनजाति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रांची, सिंहभूम, हजारीबाग, पलामू और मानभूम के बड़े हिस्से तक फैल गया था। बुधु भगत की शहादत ने साबित किया कि झारखंड का आदिवासी समाज अपनी जमीन और स्वशासन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था।Independence Day 2026: सिदो-कान्हू के साथ खड़ी रहीं फूलो और झानो मुर्मू
संताल हूल (1855) की चर्चा में सिदो और कान्हू मुर्मू का नाम अपेक्षाकृत जाना-पहचाना है, लेकिन इस विद्रोह की एक कम बताई जाने वाली परत है — उनकी बहनें फूलो मुर्मू और झानो मुर्मू। दोनों बहनों ने न सिर्फ विद्रोह में हिस्सा लिया, बल्कि हथियार उठाकर सीधे मोर्चे पर लड़ीं। महिला आदिवासी योद्धाओं की यह गाथा बताती है कि 19वीं सदी के इस प्रतिरोध में सिर्फ पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी बराबर की भागीदार थीं — भले ही इतिहास की किताबों में इन्हें हाशिये पर रखा गया हो।Independence Day 2026: नीलांबर-पीतांबर: भोगता समुदाय के दो भाई जिन्होंने 1857 में अलख जगाई
पलामू क्षेत्र के भोगता समुदाय से आने वाले नीलांबर और पीतांबर की गाथा भी बहुत कम लोगों तक पहुंची है। 1857 के विद्रोह के दौरान इन दोनों भाइयों ने अपने समुदाय को संगठित कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुला मोर्चा खोला। पकड़े जाने के बाद दोनों को फांसी की सजा दी गई। आज पलामू क्षेत्र में इन्हें स्थानीय स्तर पर याद जरूर किया जाता है, लेकिन राष्ट्रीय पहचान से ये दोनों भाई अब भी दूर हैं।Independence Day 2026: तेलंगा खड़िया: खड़िया जनजाति का वह सेनानी जिसने अंग्रेजी कर-व्यवस्था को चुनौती दी
गुमला जिले के मुरगू गांव में 1806 में जन्मे तेलंगा खड़िया ने 1850 से 1860 के दशक में छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ संगठित प्रतिरोध खड़ा किया। उन्होंने अंग्रेजी कर-व्यवस्था मानने से इनकार किया और अपने समुदाय की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को बनाए रखने पर अड़े रहे। अंग्रेजों के खजानों पर हमले करने वाले तेलंगा खड़िया को अंततः धोखे से घेरकर गोली मार दी गई। खड़िया जनजाति के इस नायक का नाम आज भी ज्यादातर स्थानीय स्तर तक ही सीमित है।Independence Day 2026: शेख भिखारी और ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव: 1857 की रांची लड़ाई के भूले-बिसरे हीरो
झारखंड के 1857 के संग्राम में एक और अहम अध्याय है रांची और चुटूपालू की लड़ाइयों का, जिसका नेतृत्व ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव और शेख भिखारी ने किया। शेख भिखारी ने “मुक्ति वाहिनी” के सक्रिय सदस्य के तौर पर संताल परगना के लोगों को भी संगठित किया था। अगस्त 1857 में रांची पर अंग्रेजी हमले के दौरान इन दोनों की रणनीति ने ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी, हालांकि सीमित हथियारों के आगे यह प्रतिरोध ज्यादा दिन नहीं टिक सका।Independence Day 2026: जतरा भगत और ताना भगत आंदोलन: अहिंसा के रास्ते पर चला आदिवासी संघर्ष
बिरसा मुंडा की शहादत के बाद भी छोटानागपुर में प्रतिरोध थमा नहीं। जतरा भगत ने 1914 के आसपास “ताना भगत आंदोलन” की शुरुआत की, जिसने आदिवासी समुदाय को अंग्रेजी शोषण और सामंती व्यवस्था के खिलाफ फिर से संगठित किया। दिलचस्प बात यह है कि बाद के वर्षों में यह आंदोलन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से भी जुड़ गया, और आज भी झारखंड में ताना भगत समुदाय खुद को स्वतंत्रता संग्राम की उसी विरासत से जोड़कर देखता है।Independence Day 2026: आजादी के बाद तक चली लड़ाई: उषा रानी मुखर्जी जैसी महिलाओं का योगदान
झारखंड के प्रतिरोध की कहानी सिर्फ 19वीं सदी तक सीमित नहीं है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उषा रानी मुखर्जी ने सक्रिय भूमिका निभाई और गिरफ्तारी के बाद उन्हें भागलपुर जेल में महीनों बंद रखा गया। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने संताल परगना क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाने का काम जारी रखा। ऐसी कई महिलाएं रहीं जिनका योगदान स्थानीय स्मृतियों में तो दर्ज है, लेकिन राष्ट्रीय आख्यान में उन्हें वह जगह नहीं मिली जिसकी वे हकदार थीं।इन नामों को भुला क्यों दिया गया?
इतिहासकार इसकी कई वजहें बताते हैं — इनमें से ज्यादातर आंदोलन दूरदराज के जंगली-पहाड़ी इलाकों में हुए, जहां उस दौर के दस्तावेजीकरण की पहुंच सीमित थी। भाषा और लिपि की बाधाएं भी रहीं, क्योंकि इन आंदोलनों की स्मृति मुख्य रूप से मौखिक परंपरा, लोकगीतों और सामुदायिक स्मारकों के जरिए आगे बढ़ी। इसके अलावा राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास लेखन लंबे समय तक शहरी, अंग्रेजी-शिक्षित नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा, जिससे आदिवासी और स्थानीय प्रतिरोध की कहानियां हाशिये पर चली गईं। अच्छी बात यह है कि यह तस्वीर अब बदल रही है। रांची समेत देश के कई शहरों में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय बनाए जा रहे हैं, जो इन गुमनाम नायकों को नई पहचान दे रहे हैं। स्कूली किताबों और सरकारी कार्यक्रमों में भी धीरे-धीरे इनका उल्लेख बढ़ रहा है।याद रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है
झारखंड की मिट्टी ने बिरसा मुंडा से बहुत पहले और उसके बाद भी अनगिनत ऐसे सेनानी दिए, जिन्होंने अपनी जमीन, संस्कृति और स्वाभिमान के लिए अंग्रेजी सत्ता से टक्कर ली। तिलका मांझी से लेकर फूलो-झानो मुर्मू तक, बुधु भगत से लेकर जतरा भगत तक — इन नामों को याद करना सिर्फ इतिहास के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी को पूरा करने की जिम्मेदारी भी है। इस स्वतंत्रता दिवस पर इन गुमनाम नायकों को याद करना, आजादी की असली, समावेशी तस्वीर को समझने का एक जरूरी कदम है। (यह लेख सामान्य ऐतिहासिक जानकारी पर आधारित है। तिथियों और घटनाओं को लेकर विभिन्न स्रोतों में मामूली अंतर मिल सकता है; पाठक स्थानीय अभिलेखागार और मान्यता-प्राप्त इतिहास ग्रंथों से पुष्टि कर सकते हैं।)
विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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