25 जून 1975 की रात भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐसा मोड़ था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा की. यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत लिया गया, जिसमें “आंतरिक अशांति” को आधार बनाया गया था. यह अवधि 21 महीनों तक चली (जून 1975 से मार्च 1977 तक) और इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काले अध्याय के रूप में देखा जाता है.
आपातकाल के प्रमुख कारण:
- राजनीतिक अस्थिरता और विरोध:
इंदिरा गांधी की सरकार को विपक्षी दलों और सामाजिक आंदोलनों से तीव्र विरोध का सामना करना पड़ रहा था. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में “संपूर्ण क्रांति” आंदोलन ने सरकार की नीतियों के खिलाफ जन समर्थन जुटाया. यह आंदोलन एक बड़े राजनीतिक विरोध का रूप ले चुका था, जिससे सरकार को खतरा महसूस हो रहा था. - न्यायिक संकट:
12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी के 1971 के लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. इससे उनकी प्रधानमंत्री पद की वैधता पर सवाल उठ गया था, और उनकी सरकार की स्थिति कमजोर हो गई थी. - आंतरिक सुरक्षा का हवाला:
सरकार ने देश में “आंतरिक अशांति” और “राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा” बताते हुए आपातकाल लागू किया, हालांकि असल में यह सत्ता बचाने का एक राजनीतिक कदम था. यह सरकार के अधिकारों को बढ़ाने और विरोधी आंदोलनों को कुचलने का तरीका था.
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आपातकाल के दौरान उठाए गए कदम:
- मौलिक अधिकारों का निलंबन:
संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 सहित कई मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया. इससे नागरिकों की स्वतंत्रता पर सीधा असर पड़ा. - मीडिया सेंसरशिप:
समाचार पत्रों पर कड़ी सेंसरशिप लागू की गई. कई अखबारों ने विरोध स्वरूप खाली पन्ने छापे, जबकि कुछ समाचार पत्रों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया. - राजनीतिक गिरफ्तारियाँ:
हजारों विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया. यह सरकार की आलोचना करने वालों को चुप कराने की कोशिश थी. - संवैधानिक संशोधन:
42वां संविधान संशोधन लाया गया, जिससे संसद और प्रधानमंत्री की शक्तियाँ और बढ़ा दी गईं. यह संशोधन लोकतंत्र के संतुलन को नुकसान पहुँचाने वाला था.
देशव्यापी प्रभाव:
- लोकतंत्र पर आघात:
संसद, न्यायपालिका और प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर चोट पहुँची. नागरिकों के अधिकारों को कुचल दिया गया, और देश में लोकतंत्र की बजाय एक तानाशाही-like स्थिति बन गई. - जनता में भय और असंतोष:
आम जनता में भय का माहौल बन गया. विरोध की हर आवाज को दबा दिया गया, जिससे एक राजनीतिक और सामाजिक असंतोष फैल गया. - जनसंख्या नियंत्रण और नसबंदी अभियान:
संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी जैसे कार्यक्रम चलाए गए, जिससे खासकर उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भारी असंतोष फैला. इस कदम ने जनता के बीच गहरी नाराजगी पैदा की.
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सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र:
इमरजेंसी का सबसे ज्यादा असर कुछ विशेष स्थानों पर हुआ था:
- दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी):
दिल्ली में तो सीधे तौर पर नियंत्रण था और यहाँ पर राजनीतिक नेताओं, एक्टिविस्टों और पत्रकारों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया था. इंदिरा गांधी की सरकार ने यहाँ पर अपने विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था, जिनमें जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े नेता भी शामिल थे. - उत्तर प्रदेश और बिहार:
इन राज्यों में भी काफी विरोधी आंदोलन चल रहे थे, और ये दोनों राज्य उन क्षेत्रों में थे जहाँ इमरजेंसी के दौरान सबसे ज्यादा विपक्ष था. जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं का यहाँ पर काफी प्रभाव था. इन जगहों पर उनके समर्थकों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. - पश्चिम बंगाल:
यह राज्य भी राजनीतिक अशांति का केंद्र बना था, खासकर लेफ्टिस्ट समूहों के आंदोलनों के कारण. यहाँ के राजनीतिक एक्टिविस्टों को भी बहुत यातना और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था. - दक्षिण भारत (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटका):
ये क्षेत्र भी विपक्ष से भरे हुए थे, और यहाँ भी इमरजेंसी के दौरान विपक्ष पर कड़ी कार्रवाई की गई थी. तमिलनाडु में, M. करुणानिधि जैसे नेताओं को गिरफ्तार किया गया था. - महाराष्ट्र:
यह राज्य भी विपक्षी गतिविधियों के लिए जाना जाता था. यहाँ भी कम्युनिस्ट और समाजवादी आंदोलनों का प्रभाव था. ऐसे में, यह क्षेत्र भी इमरजेंसी के दौरान प्रभावित रहा था.
जहाँ तक आर्थिक प्रभाव की बात है, तो पूरे देश में गंभीर राशनिंग और बेरोजगारी जैसी समस्याएं थीं. वित्तीय स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ा था, लेकिन राजनीतिक दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे ज्यादा असर उन क्षेत्रों में था जहाँ विपक्ष का प्रभाव ज्यादा था.
आपातकाल का अंत और लोकतंत्र की बहाली:
मार्च 1977 में आपातकाल हटा लिया गया और आम चुनाव कराए गए, जिसमें इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. जनता पार्टी की सरकार बनी और लोकतंत्र की बहाली हुई.
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आपातकाल ने यह सिखाया:
आपातकाल ने यह सिखाया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों और स्वतंत्र संस्थाओं से होती है. लोकतंत्र के स्तंभों को मजबूत करना और किसी भी तरह के राजनीतिक दमन के खिलाफ खड़ा होना जरूरी है, ताकि सत्ता का दुरुपयोग न हो और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जाए.













