Jharkhand: हर साल, झारखंड में सैकड़ों बच्चे गायब हो जाते हैं। कुछ व्यस्त बाजारों से गायब हो जाते हैं। कुछ अपने घरों के दरवाजों से तो कुछ ही कदम दूर से गायब हो जाते हैं। ज़्यादातर परिवारों को कोई जवाब नहीं मिलता—बस एक लंबा, दर्दनाक इंतज़ार और डर का बढ़ता हुआ एहसास जो हर माता-पिता पर हावी रहता है।
डराते है ये आंकड़े
ये संख्याएँ सिर्फ़ आँकड़े नहीं हैं। ये ओरमांझी के कन्हैया कुमार, या धुर्वा के भाई-बहन अंश और अंशिका जैसे बच्चों की कहानियाँ हैं, जो बिना किसी निशान के गायब हो गए। उनके गायब होने से रांची और आस-पास के कस्बों में गुस्सा भड़क गया है, लोग जानना चाहते हैं कि इतने सारे बच्चे—खासकर गरीब या आदिवासी समुदाय के बच्चे—क्यों गायब हो रहे हैं।
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हर साल इतने बच्चे होते है लापता
इन आँकड़ों को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो का कहना है कि झारखंड में हर साल 300 से 400 बच्चे गायब हो जाते हैं। उनमें से लगभग एक चौथाई कभी नहीं मिलते। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार 2019 में 356, 2020 में 340 और 2021 में 400 बच्चे लापता हुए। पिछले एक दशक में, 4,000 से ज़्यादा बच्चे गायब हो गए हैं, और 1,000 से ज़्यादा मामले अभी भी अनसुलझे हैं। फिर भी, शुरुआती सुर्खियों के बाद, यह मुद्दा शायद ही कभी सुर्खियों में रहता है।
सालों से राह देख रहे मां-बाप
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि परिवार लगातार चिंता में जीते हैं। कई माता-पिता अब अपने बच्चों को बाहर खेलने या अकेले स्कूल जाने नहीं देते। जो जगहें पहले सुरक्षित लगती थीं—बाजार, बस स्टॉप, यहाँ तक कि स्कूल से घर का रास्ता—अब खतरनाक लगती हैं। जिनके बच्चे लापता हैं, उनके लिए ज़िंदगी थम सी गई है। माता-पिता सालों तक पुलिस स्टेशनों के दरवाज़े खटखटाते हैं, अफवाहों का पीछा करते हैं, और हर फोन कॉल का इंतज़ार करते हैं। इनमें से ज़्यादातर परिवार पहले से ही गुज़ारा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और इस नुकसान से चीजें और भी मुश्किल हो जाती हैं।
आखिर कहां जाते है गायब हुए बच्चे ?
तो ये बच्चे कहाँ जाते हैं? बाल संरक्षण में काम करने वाले लोगों का कहना है कि इनमें से कई मामलों के पीछे संगठित तस्करी नेटवर्क हैं। बच्चों को दूसरे राज्यों में तस्करी करके ले जाया जाता है और भीख मांगने वाले गिरोहों में धकेल दिया जाता है, होटलों या सड़क किनारे ढाबों, छोटी फैक्ट्रियों, कॉटन मिलों, या बिल्डिंग साइटों पर काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। ज़्यादातर को पैसे नहीं मिलते। वे अपनी शिक्षा का मौका खो देते हैं और अक्सर दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं। वे जितने लंबे समय तक गायब रहते हैं, उनके घर लौटने की संभावना उतनी ही कम होती जाती है।
कौन है इसका जिम्मेवार ?
एक और समस्या है: इन बच्चों की रक्षा के लिए बनाया गया सिस्टम काम नहीं कर रहा है। झारखंड में पूरी तरह से काम करने वाला चाइल्ड प्रोटेक्शन कमीशन नहीं है। अलग-अलग राज्यों की पुलिस जानकारी तेज़ी से शेयर नहीं करती। FIR दर्ज होने में देरी होती है। जब कोई बच्चा लापता होता है, तो उसकी रियल-टाइम ट्रैकिंग नहीं होती। पुलिस आमतौर पर शुरू में तो ज़ोरदार तलाशी लेती है, लेकिन दबाव कम हो जाता है और मामले भुला दिए जाते हैं।
झारखण्ड में सिस्टम को मजबूत करने की मांग ?
पूरे झारखंड में लोग बड़े बदलावों की मांग कर रहे हैं। वे लापता बच्चों को ढूंढने के लिए मज़बूत सिस्टम, राज्यों के बीच तेज़ी से तालमेल, कम्युनिटी में जागरूकता अभियान और एक टास्क फोर्स चाहते हैं जो सिर्फ़ ऐसे मामलों को देखे। जब तक ऐसा नहीं होता, परिवार इंतज़ार करते रहेंगे और चिंता करते रहेंगे, और बहुत सारे बच्चे गायब होते रहेंगे – पीछे सिर्फ़ ऐसे सवाल छूट जाएंगे जिनका जवाब कोई नहीं दे पाएगा।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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