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Aravali Controversy: क्या खत्म हो जाएगा अरावली का अस्तित्व? जानें क्या है 100 मीटर का विवाद

दिसम्बर 29, 2025
in देश National News, राजनीति Politics
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Aravali Controversy: क्या खत्म हो जाएगा अरावली का अस्तित्व? जानें क्या है 100 मीटर का विवाद
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Aravali Controversy: अरावली पर्वत श्रृंखला, जो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रेणियों में से एक है, आज एक कानूनी और तकनीकी लड़ाई के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अरावली की परिभाषा और उससे जुड़े ‘100 मीटर नियम’ के खिलाफ दायर याचिका को स्वीकार कर लिया है। इस एक छोटे से तकनीकी आंकड़े ने पर्यावरणविदों, सरकार और न्यायपालिका के बीच एक बड़ी बहस छेड़ दी है।

Table of Contents

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  • Aravali Controversy: क्या है 100 मीटर का विवाद?
  • ऐसे समझें Aravali Controversy के मुख्य कारण
  • Aravali Controversy में सरकार का पक्ष: ‘यह सिर्फ एक गलतफहमी है’
  • अरावली का अस्तित्व संकट में क्यों?
  • Aravali Controversy में सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट पर

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Aravali Controversy: क्या है 100 मीटर का विवाद?

नवंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) की एक समिति की सिफारिश को स्वीकार किया था। इसके तहत तय किया गया कि स्थानीय जमीनी स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही ‘अरावली’ के रूप में परिभाषित किया जाएगा। इसके साथ ही उनकी ढलान और आसपास की जमीन को भी इस दायरे में रखा गया।

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Aravali Controversy से सैंकड़ों पहाड़ियां खतरे में
Aravali Controversy से सैंकड़ों पहाड़ियां खतरे में

विरोध का कारण: हरियाणा के पूर्व वन अधिकारी आरपी बलवान और अन्य विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा, तो इससे कम ऊंचाई वाली हजारों छोटी पहाड़ियां ‘अरावली’ के कानूनी दायरे से बाहर हो जाएंगी। इसका सीधा मतलब है कि उन छोटी पहाड़ियों पर खनन और निर्माण कार्य शुरू हो सकते हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो जाएगा।

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ऐसे समझें Aravali Controversy के मुख्य कारण

1. सुरक्षा कवच का टूटना अरावली श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक जाती है। यह थार रेगिस्तान की धूल भरी आंधियों को गंगा के मैदानी इलाकों (दिल्ली-एनसीआर) तक पहुँचने से रोकने वाली एक प्राकृतिक दीवार है। यदि छोटी पहाड़ियों को सुरक्षा के दायरे से हटाया गया, तो यह ‘दीवार’ कमजोर हो जाएगी और रेगिस्तान का विस्तार तेजी से बढ़ेगा।

2. जल स्तर का गिरना अरावली की पहाड़ियां भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का मुख्य स्रोत हैं। पहाड़ियों और उनके आसपास की जमीन बारिश के पानी को सोखकर जमीन के नीचे भेजती है। खनन होने से यह प्रक्रिया रुक जाएगी, जिससे गुरुग्राम, फरीदाबाद और दिल्ली जैसे शहरों में पानी का संकट गहरा जाएगा।

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3. विरोधाभासी परिभाषाएं याचिकाकर्ता का कहना है कि 1996 के ‘टीएन गोदावरमन’ केस में सुप्रीम कोर्ट ने ‘वन’ की व्यापक परिभाषा दी थी। अब नई परिभाषा उस पुराने आदेश और पर्यावरण की सुरक्षा की मूल भावना के विपरीत नजर आ रही है।

4. खनन माफियाओं को लाभ मिलने का डर पर्यावरणविदों को डर है कि 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को ‘गैर-अरावली’ घोषित करने से खनन माफियाओं के लिए रास्ता खुल जाएगा। हालांकि सरकार ने कहा है कि जब तक टिकाऊ खनन योजना नहीं बनती, कोई नया पट्टा नहीं दिया जाएगा, लेकिन जमीन पर स्थिति इसके उलट हो सकती है।

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Aravali Controversy में सरकार का पक्ष: ‘यह सिर्फ एक गलतफहमी है’

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया है कि 100 मीटर का नियम राजस्थान में 2006 से प्रभावी है और इससे अधिकांश महत्वपूर्ण क्षेत्र पहले से ही सुरक्षित हैं। सरकार का तर्क है कि एक ‘यूनिफॉर्म परिभाषा’ होने से प्रशासनिक कार्यों और पर्यावरण संरक्षण में स्पष्टता आएगी। सरकार का दावा है कि वह विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना चाहती है।

अरावली का अस्तित्व संकट में क्यों?

अरावली का मुद्दा केवल जमीन के एक टुकड़े का नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ा है।

  • जैव विविधता: यहाँ तेंदुओं, नीलगायों और सैकड़ों पक्षियों की प्रजातियाँ रहती हैं। छोटी पहाड़ियों के कटने से इनका आवास छिन जाएगा, जिससे ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ बढ़ेगा।

  • प्रदूषण: दिल्ली-एनसीआर पहले से ही प्रदूषण से जूझ रहा है। अरावली के फेफड़े (जंगल) अगर कम हुए, तो हवा की गुणवत्ता और भी खराब होगी।

  • रेगिस्तानीकरण: वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि अरावली में दरारें पड़ने से थार रेगिस्तान उत्तर भारत की ओर खिसक रहा है।

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Aravali Controversy में सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट पर

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 17 दिसंबर को केंद्र और राज्य सरकारों से मांगा गया जवाब इस मामले में निर्णायक होगा। क्या भारत अपनी सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला को बचाने के लिए कड़े नियमों को अपनाएगा या तकनीकी परिभाषाओं के फेर में अरावली का वजूद खतरे में पड़ जाएगा? यह आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल, ‘100 मीटर’ का यह आंकड़ा भविष्य के पर्यावरण की रूपरेखा तय करने वाला है।

Neeraj Toppo

I have four years of experience in journalism. Previously, I worked with organizations such as Swadesh Today, News 11 Bharat, and News 22 Scope. For the past year, I have been working as a content writer at Khabar Mantra.

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