Jharkhand: झारखंड की राजनीति में 10 अगस्त की तारीख अब सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह उस नेता का जन्मदिन है, जिसकी राजनीतिक पहचान एक परिवार की विरासत से निकलकर संघर्ष, सत्ता, विपक्ष, कानूनी संकट और फिर सत्ता में वापसी की कहानी बन चुकी है। झारखंड के मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के केंद्रीय अध्यक्ष हेमंत सोरेन 10 अगस्त 2026 को अपना 51वां जन्मदिन मना रहे हैं।
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक हेमंत सोरेन का जन्म 10 अगस्त 1975 को रामगढ़ में हुआ था। उनके पिता झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे और JMM के संस्थापक शिबू सोरेन हैं। मां का नाम रूपी सोरेन है। हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना मुर्मू सोरेन हैं और उनके दो बच्चे हैं।
लेकिन हेमंत सोरेन की कहानी को सिर्फ ‘शिबू सोरेन के बेटे’ के तौर पर पढ़ना उनकी राजनीतिक यात्रा को छोटा कर देना होगा। उनके सफर में एक ऐसा दौर भी आया जब उन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष किया, चुनाव हारे, संगठन में जिम्मेदारी संभाली, राज्यसभा पहुंचे, विधायक बने, उपमुख्यमंत्री रहे, पहली बार मुख्यमंत्री बने, सत्ता गंवाई, फिर पांच साल बाद जबरदस्त वापसी की और अंततः अपने पिता से JMM की केंद्रीय कमान भी संभाल ली।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई से राजनीति तक कैसे पहुंचे हेमंत सोरेन?
हेमंत सोरेन की शुरुआती शिक्षा झारखंड और बिहार में हुई। उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार उन्होंने मैट्रिक और इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद BIT Mesra में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था, लेकिन पढ़ाई पूरी नहीं की। बाद में उनका झुकाव सक्रिय राजनीति की तरफ बढ़ता गया। उन्होंने 2003 में JMM की छात्र इकाई झारखंड छात्र मोर्चा के अध्यक्ष के रूप में राजनीतिक सक्रियता शुरू की थी। यह तथ्य उनकी कहानी का एक दिलचस्प पहलू है। आज जिस व्यक्ति को झारखंड की सत्ता के शीर्ष पर देखा जाता है, उसकी औपचारिक राजनीतिक यात्रा मुख्यमंत्री की कुर्सी से नहीं बल्कि छात्र संगठन से शुरू हुई थी।पहला चुनाव और हार ने सिखाया बड़ा सबक
हेमंत सोरेन ने 2005 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने दुमका से चुनाव मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक पारी शुरू की, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। यह हार उस दौर में खास थी क्योंकि वे ऐसे राजनीतिक परिवार से आते थे, जिसकी झारखंड में मजबूत पहचान थी। इसके बाद 2009 उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक साल बना। राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज है कि हेमंत सोरेन ने 2 जुलाई 2009 को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली थी। लेकिन संसद का यह सफर बहुत लंबा नहीं चला। उसी वर्ष उन्होंने विधानसभा राजनीति की ओर वापसी की और राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका तेजी से बढ़ने लगी।2010: उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे
हेमंत सोरेन के लिए अगला बड़ा पड़ाव झारखंड के उपमुख्यमंत्री का पद था। वे अर्जुन मुंडा सरकार में उपमुख्यमंत्री बने और करीब दो साल से ज्यादा समय तक इस भूमिका में रहे। यही वह दौर था जब हेमंत सोरेन को केवल शिबू सोरेन के बेटे के रूप में नहीं बल्कि JMM के अगली पीढ़ी के नेता के तौर पर देखा जाने लगा। राजनीति में उनके लिए सबसे बड़ा परीक्षण अभी बाकी था।2013 में सिर्फ 38 साल की उम्र में पहली बार मुख्यमंत्री
15 जुलाई 2013 को हेमंत सोरेन पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र करीब 38 साल थी। यह उनका पहला मुख्यमंत्री कार्यकाल था और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण भी। लेकिन सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की सत्ता में बदलाव हुआ और हेमंत सोरेन विपक्ष की राजनीति में चले गए। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन का वह दौर शुरू हुआ जिसमें सत्ता से ज्यादा संगठन और विपक्ष की राजनीति ने उन्हें आकार दिया।2014 से 2019: पांच साल की तैयारी
2014 के बाद हेमंत सोरेन ने JMM को मजबूत करने पर ध्यान दिया। यही वह समय था जब पार्टी ने क्षेत्रीय मुद्दों, आदिवासी अधिकारों, स्थानीय पहचान और जमीन-जंगल-जमीन से जुड़े सवालों को अपने राजनीतिक अभियान का केंद्र बनाया। 2019 के विधानसभा चुनाव ने इस रणनीति को चुनावी सफलता में बदल दिया। JMM ने 2019 में 30 विधानसभा सीटें जीतीं और हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने। JMM के आधिकारिक इतिहास में भी 2019 के चुनाव को पार्टी के सत्ता में लौटने के निर्णायक पड़ाव के रूप में दर्ज किया गया है।2019 के बाद बदली सरकार की राजनीति
दूसरे कार्यकाल में हेमंत सोरेन सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा को राजनीतिक प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ाया। झारखंड सरकार की उपलब्धियों की आधिकारिक सूची में ग्रामीण आवास, शहरी आवास, ग्रामीण सड़क, पेयजल और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के आंकड़े दर्ज हैं। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक 7 लाख 68 हजार 395 ग्रामीण आवासों का निर्माण पूरा होने और 1,88,842 शहरी आवासहीनों के लिए आवास स्वीकृति जैसी उपलब्धियां दर्ज की गई हैं। सरकार का आधिकारिक विजन भी केवल सड़क, पुल और भवन निर्माण तक सीमित नहीं बताया गया है। मुख्यमंत्री कार्यालय के संदेश में हेमंत सोरेन ने विकास को ‘व्यक्ति निर्माण’ आधारित मॉडल से जोड़ने और समावेशी झारखंड बनाने की बात कही है।फिर आया 2024: सत्ता, गिरफ्तारी और राजनीतिक भूचाल
हेमंत सोरेन के राजनीतिक जीवन का सबसे कठिन दौर 2024 की शुरुआत में आया। भूमि से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें 31 जनवरी 2024 को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी से पहले उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और चंपाई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद हेमंत सोरेन लंबे समय तक जेल में रहे। 27 जून 2024 को झारखंड हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी। इसके बाद वे फिर सक्रिय राजनीति में लौटे। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में ED की उस चुनौती में हाईकोर्ट के जमानत आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था। यह दौर हेमंत सोरेन के लिए सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं था। यह उनके राजनीतिक अस्तित्व की भी सबसे बड़ी परीक्षा थी।जेल से लौटे तो कहानी खत्म नहीं, नया अध्याय शुरू हुआ
जून 2024 में जेल से बाहर आने के बाद हेमंत सोरेन ने राजनीति में तेजी से वापसी की। नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बरहेट सीट से फिर जीत दर्ज की। उपलब्ध चुनाव परिणामों के मुताबिक हेमंत सोरेन को 95,612 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 55,821 वोट मिले। उनकी जीत का अंतर 39,791 वोट रहा। लेकिन व्यक्तिगत जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण था पूरे गठबंधन का प्रदर्शन। 2024 में JMM ने 34 सीटें जीतीं और वह विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी। JMM के आधिकारिक पार्टी इतिहास में भी 2024 के चुनाव को उसके सबसे मजबूत चुनावी प्रदर्शनों में गिना गया है। 28 नवंबर 2024 को हेमंत सोरेन ने फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली यानी जिस साल की शुरुआत में वह मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटे और जेल गए थे, उसी साल के अंत में वह चुनाव जीतकर दोबारा उसी कुर्सी पर लौटे। यही उनके राजनीतिक जीवन का शायद सबसे बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ है।2025 में पिता शिबू सोरेन से मिली सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत
हेमंत सोरेन के जीवन में 2025 एक और ऐतिहासिक साल बना। अप्रैल 2025 में JMM के केंद्रीय अधिवेशन में शिबू सोरेन ने पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पद से हटकर ‘फाउंडिंग पैट्रन’ की भूमिका स्वीकार की और हेमंत सोरेन को पार्टी का केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया। इसका राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा है। शिबू सोरेन ने दशकों तक JMM की कमान संभाली थी। ऐसे में हेमंत का पार्टी अध्यक्ष बनना सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं बल्कि JMM की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक औपचारिक सत्ता हस्तांतरण भी था। यानी अब हेमंत सोरेन के पास एक साथ दो बड़ी जिम्मेदारियां हैं-सरकार चलाना और JMM को आगे ले जाना।हेमंत सोरेन की राजनीति में ‘परिवार’ से ज्यादा बड़ी चुनौती क्या है?
हेमंत सोरेन की राजनीति को समझने के लिए सिर्फ परिवार की विरासत देखना पर्याप्त नहीं है।उनके सामने आज तीन बड़े राजनीतिक सवाल हैं।
पहला-आदिवासी राजनीति का भविष्य
JMM की मूल राजनीति झारखंड की पहचान, आदिवासी अधिकार और क्षेत्रीय अस्मिता के इर्द-गिर्द रही है। हेमंत सोरेन के सामने चुनौती है कि इस पारंपरिक आधार को नई पीढ़ी की आकांक्षाओं से कैसे जोड़ा जाए।दूसरा-रोजगार और परीक्षा व्यवस्था
2026 में JPSC-JSSC को लेकर छात्रों का आंदोलन सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक दबाव बन चुका है। 9 अगस्त 2026 को भी हेमंत सोरेन ने प्रदर्शन कर रहे युवाओं से बातचीत के जरिए समस्या सुलझाने और आंदोलन को राजनीतिक रूप न देने की अपील की। इसलिए 51वें जन्मदिन पर हेमंत सोरेन के सामने युवाओं और रोजगार का सवाल सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौतियों में से एक है।तीसरा-विरासत को शासन में बदलना
शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन और आदिवासी राजनीति के जरिए एक राजनीतिक विरासत बनाई। हेमंत सोरेन के सामने चुनौती उस विरासत को आधुनिक शासन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल प्रशासन और आर्थिक विकास के मॉडल में बदलने की है। मुख्यमंत्री कार्यालय की हालिया गतिविधियां बताती हैं कि सरकार उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, AI आधारित सुशासन, डिजिटल परिवर्तन, शहरी विकास और पर्यटन जैसे क्षेत्रों पर भी काम कर रही है।51वें जन्मदिन पर हेमंत सोरेन के सामने कैसी है तस्वीर?
10 अगस्त 2026 को जब हेमंत सोरेन 51 वर्ष के होंगे, तब उनके राजनीतिक जीवन की तस्वीर किसी सामान्य जन्मदिन की कहानी जैसी नहीं है। एक तरफ उनके पास पांच दशक का जीवन अनुभव, मुख्यमंत्री के रूप में कई कार्यकाल, 2024 की चुनावी जीत और JMM की केंद्रीय कमान है। दूसरी तरफ रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही, विपक्ष के हमले और योजनाओं के वास्तविक क्रियान्वयन जैसी चुनौतियां भी सामने हैं। यही विरोधाभास हेमंत सोरेन की राजनीति को दिलचस्प बनाता है। वह नेता जिसने 2005 में चुनावी हार देखी, 2009 में राज्यसभा पहुंचा, 2010 में उपमुख्यमंत्री बना, 2013 में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली, 2014 में सत्ता गंवाई, 2019 में जोरदार वापसी की, 2024 में जेल गया, उसी साल चुनाव जीतकर फिर मुख्यमंत्री बना और 2025 में अपने पिता से JMM की केंद्रीय कमान हासिल कर ली। इस लिहाज से हेमंत सोरेन की कहानी सिर्फ एक मुख्यमंत्री की जीवनी नहीं है। यह झारखंड की क्षेत्रीय राजनीति में एक पीढ़ी के नेतृत्व से दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व तक हुए बदलाव की कहानी भी है। और शायद यही उनके 51वें जन्मदिन की सबसे अलग कहानी है-सवाल यह नहीं कि हेमंत सोरेन यहां तक कैसे पहुंचे, बल्कि यह है कि अब उनके पास मिली विरासत को वह अगले दशक की राजनीति में किस रूप में बदलते हैं।
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