काठमांडू: Nepal के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में बुधवार को आई प्राकृतिक आपदा ने हिमालय की संवेदनशीलता को एक बार फिर सामने ला दिया। लांगटांग लिरुंग पर्वत क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़े बड़े हिमस्खलन के बाद बर्फ, चट्टान, पानी और मलबे का तेज बहाव घाटियों की ओर बढ़ा और देखते ही देखते कई इलाकों में भारी तबाही मचा दी।
काठमांडू से करीब 45 किलोमीटर उत्तर स्थित 7,234 मीटर ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत के आसपास हुई इस घटना का असर नेपाल-तिब्बत सीमा के नजदीकी इलाकों से लेकर त्रिशुली नदी की घाटी तक देखा गया। शुरुआती विशेषज्ञ विश्लेषण के मुताबिक, यह घटना ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने और उसके साथ पहाड़ी मलबे के नीचे गिरने से शुरू हुई।
हजारों फीट की ऊंचाई से टूटा ग्लेशियर का हिस्सा
सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर लगभग 4 हजार फीट नीचे घाटी में जा गिरा। बताया जा रहा है कि टूटे हुए बर्फीले हिस्से की चौड़ाई करीब 2 हजार फीट थी।
भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानों के नीचे गिरने से जबरदस्त दबाव पैदा हुआ। इसके बाद पानी, मिट्टी, बर्फ और पत्थरों का मलबा तेजी से घाटी की ओर बढ़ा और एक विशाल मलबा-लहर का रूप ले लिया। यह बहाव आगे चलकर त्रिशुली नदी में जा मिला।
भूकंप ने बढ़ाई चिंता, लेकिन कारण को लेकर वैज्ञानिकों में मतभेद
घटना के आसपास के समय चीन सीमा के पास 4.4 तीव्रता का भूकंप भी दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी यह स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि भूकंप ने पहले से कमजोर पहाड़ी ढलान और ग्लेशियर को अस्थिर किया या फिर ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने से पैदा हुए दबाव ने स्थानीय स्तर पर भूकंपीय कंपन को जन्म दिया।
यही वजह है कि इस आपदा के वास्तविक ट्रिगर को समझने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत होगी।
जलवायु परिवर्तन भी बन रहा बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का पीछे हटना, पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना और ग्लेशियर के आसपास बनी मोरेन का कमजोर होना ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकता है।
ग्लेशियरों के पीछे हटने से बनी झीलों और ढलानों में जमा पानी तथा मलबा कई बार अचानक नीचे की ओर बहने लगता है। मानसून के दौरान भारी बारिश इस जोखिम को और बढ़ा देती है।
लांगटांग लिरुंग का इतिहास भी रहा है बेहद दर्दनाक
लांगटांग लिरुंग क्षेत्र पहले भी बड़ी प्राकृतिक त्रासदी का गवाह रह चुका है। अप्रैल 2015 में नेपाल में आए 7.8 तीव्रता के भूकंप के बाद इस पर्वतीय क्षेत्र में बड़ा हिमस्खलन हुआ था। बर्फ और मलबे के भारी बहाव ने लांगटांग गांव को अपनी चपेट में ले लिया था और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी।
मौजूदा घटना उसी पर्वतीय क्षेत्र के उत्तरी हिस्से से जुड़ी बताई जा रही है, जिससे स्थानीय लोगों के बीच डर और चिंता बढ़ गई है।
‘हिमालयी सुनामी’ जैसी घटनाओं का बढ़ता खतरा
हिमालयी क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अचानक आने वाली बाढ़, ग्लेशियर झील फटने और भूस्खलन की कई बड़ी घटनाएं सामने आई हैं। चमोली, मेलामची, सिक्किम और थामे जैसी घटनाओं ने पहले ही यह संकेत दिया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु और भूगर्भीय बदलावों के कारण आपदा का जोखिम बढ़ रहा है।
नेपाल में पिछले साल भोटे कोसी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने भी सीमा से जुड़े महत्वपूर्ण इलाकों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया था। इस बार भी सीमा के नजदीक शुरू हुए मलबे के बहाव ने बेहद कम समय में नीचे के इलाकों को प्रभावित किया।
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, पुल और बिजली ढांचे को भारी नुकसान
आपदा का असर केवल आबादी वाले इलाकों तक सीमित नहीं रहा। भोटे कोसी और त्रिशुली नदी घाटी में कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं, बिजली सबस्टेशनों और ट्रांसमिशन लाइनों के क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई है।
कई पुलों के बह जाने से उत्तरी इलाकों की सड़क संपर्क व्यवस्था प्रभावित हुई है। कुछ पुल मुख्य आपदा क्षेत्र से काफी नीचे होने के बावजूद तेज मलबा प्रवाह की चपेट में आ गए।
नुवाकोट में स्थित 25 मेगावाट के ग्रिड-स्केल सोलर प्लांट को भी भारी नुकसान पहुंचने की बात कही जा रही है। निर्माणाधीन परियोजनाओं पर भी इस आपदा का असर पड़ा है।
160 से ज्यादा मौतों की खबर, आंकड़ा बढ़ने की आशंका
गुरुवार सुबह तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आपदा में 160 से ज्यादा लोगों की मौत की खबर सामने आई है। हालांकि, प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान जारी रहने के कारण मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
त्रिशुली और नारायणी नदी के निचले हिस्सों में भी मलबे और शव मिलने की खबरों ने स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती दूरदराज के पहाड़ी इलाकों तक राहत और बचाव दल पहुंचाना है।
Nepal के सामने दोहरी चुनौती
यह आपदा केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि नेपाल के लिए भविष्य की बड़ी चुनौती का संकेत भी है। हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों का तेजी से बदलता स्वरूप, पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना, अचानक आने वाली बाढ़ और भूकंपीय गतिविधियां मिलकर जोखिम को और बढ़ा सकती हैं।
ऐसे में विशेषज्ञों का जोर बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम, सैटेलाइट निगरानी, संवेदनशील ग्लेशियरों की नियमित मॉनिटरिंग और सीमा पार आपदा प्रबंधन सहयोग पर है।
नेपाल जैसे पर्वतीय देश के लिए यह जरूरी है कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए केवल राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय पहले से जोखिम की पहचान और चेतावनी की व्यवस्था मजबूत की जाए।
हिमालय के लिए बड़ा चेतावनी संकेत
लांगटांग लिरुंग की यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि हिमालय सिर्फ बर्फ से ढके खूबसूरत पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है। यहां तेजी से बदलता मौसम, ग्लेशियरों में बदलाव और भूगर्भीय अस्थिरता आने वाले वर्षों में बड़े खतरे पैदा कर सकती है।
इसलिए नेपाल के साथ-साथ पूरे हिमालयी क्षेत्र के देशों के लिए जलवायु अनुकूलन, वैज्ञानिक निगरानी और आपदा तैयारी में निवेश अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
Expertise: Journalism • Digital Media • Ground Reporting • Content & Social Media • Video Production • News Analysis









