बिहार की माटी से उपजी सुरों की देवी शारदा सिन्हा अब हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनकी मधुर आवाज़, उनके गीत, उनकी संस्कृति को संजोने की तपस्या सदैव जीवित रहेगी. मंगलवार को जब राष्ट्र ने उनकी याद में सिर झुकाया, तब भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित कर एक युग की साधना को नमन किया.
शारदा सिन्हा ने लोकगीतों को दी नई पहचान
शारदा सिन्हा, जो छठ महापर्व की आत्मा मानी जाती थीं, उनके गीत “केलवा के पात पर उगेलन सूरज मल झार” या “पिंजड़ा के पंछी” जैसी लोकधुनें आज भी बिहार-झारखंड के हर घर में बजती हैं. उन्होंने लोकगीतों को एक नई पहचान दी और मिथिला, भोजपुरी, मगही जैसी भाषाओं को पूरे देश में पहुंचाया.
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शारदा सिन्हा का बचपन
स्वर कोकिला का जन्म बिहार के दरभंगा जिले में हुआ था. बचपन से ही संगीत के प्रति गहरी लगाव रखने वाली शारदा सिन्हा ने पटना विश्वविद्यालय से संगीत की पढ़ाई की और फिर अपनी लोकगायन शैली से श्रोताओं का दिल जीत लिया. वह सिर्फ एक गायिका नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन थीं.
पद्म विभूषण से हुई सम्मानित
पद्म श्री (1991) और पद्म भूषण (2018) जैसे सम्मानों के बाद, भारत सरकार ने उन्हें 2025 में पद्म विभूषण (मरणोपरांत) से नवाज़ा, जो उनकी कला और समाज के प्रति योगदान को सर्वोच्च श्रेणी की स्वीकृति है.
राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस गरिमामयी समारोह में जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनकी पुत्री के हाथों यह सम्मान सौंपा, तब पूरा देश भावुक हो गया. यह क्षण सिर्फ एक कलाकार को सम्मान देने का नहीं था, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति को उसके सबसे सशक्त प्रतिनिधि के रूप में स्वीकारने का था.
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शारदा के परिवार ने क्या कहा..
उनके के परिवार ने इस अवसर पर कहा कि यह सम्मान उनके जीवन की साधना का सच्चा मूल्यांकन है. वह हमेशा यही कहती थीं कि लोकगीतों में आत्मा होती है और यह आत्मा अमर है.
शारदा सिन्हा की विरासत आज भी हर पर्व, हर शादी, हर विदाई गीत में जीवंत है. वह गईं नहीं हैं, बस सुर बनकर हवाओं में घुल गई हैं.
शारदा सिन्हा की कहानी बताती है — सुरों से बड़ी कोई साधना नहीं, और संस्कृति से बड़ी कोई सेवा नहीं.













