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शिबू सोरेन की संघर्ष गाथा: जब जारी हुआ था ‘Shoot-at-Sight’ आदेश, ए.के. राय बने थे सबसे बड़े सहारा

Shibu Soren Shoot-at-Sight: झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन के संघर्षपूर्ण जीवन की कहानी जानिए। धान काटो आंदोलन, कथित Shoot-at-Sight आदेश, भूमिगत जीवन, के.बी. सक्सेना और ए.के. राय की भूमिका से लेकर झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे बनने तक का पूरा इतिहास।

जून 23, 2026
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Shibu Soren’s Saga of Struggle: When a ‘Shoot-at-Sight’ Order Was Issued, A.K. Roy Became His Greatest Support

Shibu Soren’s Saga of Struggle: When a ‘Shoot-at-Sight’ Order Was Issued

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Shibu Soren Shoot-at-Sight: झारखंड आंदोलन का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए शिबू सोरेन ने न केवल एक जनांदोलन खड़ा किया, बल्कि अलग झारखंड राज्य के सपने को भी साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Table of Contents

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    • Read More: जल-जंगल-जमीन के योद्धा शिबू सोरेन को आज देश का बड़ा सम्मान, पद्म भूषण से होंगे सम्मानित
  • शिबू सोरेन और ‘Shoot-at-Sight’ आदेश: आखिर क्या थी पूरी कहानी?
    • क्यों प्रशासन के निशाने पर आए थे शिबू सोरेन?
      • क्या सचमुच जारी हुआ था Shoot-at-Sight आदेश?
      • तत्कालीन डीसी के.बी. सक्सेना की भूमिका
      • भूमिगत जीवन और पुलिस की तलाश
      • ए.के. राय ने कैसे दिया साथ?
        • इतिहासकार क्या कहते हैं?
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आज शिबू सोरेन को झारखंड के सबसे बड़े जननेताओं में गिना जाता है, लेकिन उनका सफर आसान नहीं था। एक समय ऐसा भी आया जब तत्कालीन बिहार सरकार और प्रशासन ने उन्हें राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती मान लिया था। हालात यहां तक पहुंच गए कि उनके खिलाफ कथित तौर पर “Shoot-at-Sight” यानी देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किए जाने की चर्चा पूरे इलाके में फैल गई थी।

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शिबू सोरेन और ‘Shoot-at-Sight’ आदेश: आखिर क्या थी पूरी कहानी?

झारखंड आंदोलन के इतिहास में शिबू सोरेन के नाम से जुड़ा सबसे चर्चित और विवादित प्रसंग “Shoot-at-Sight” (देखते ही गोली मारने) आदेश का माना जाता है। हालांकि इस मामले को लेकर कई राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद हैं, लेकिन इसकी वास्तविक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है।

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क्यों प्रशासन के निशाने पर आए थे शिबू सोरेन?

1970 के दशक की शुरुआत में संथाल परगना, टुंडी, गिरिडीह और धनबाद क्षेत्र में बड़ी संख्या में आदिवासियों की जमीन महाजनों, साहूकारों और जमींदारों के कब्जे में चली गई थी। शिबू सोरेन ने इसके खिलाफ व्यापक आंदोलन शुरू किया।
उन्होंने आदिवासियों से कहा कि जिन खेतों पर उनके पूर्वजों का अधिकार था, उन खेतों की फसल काटकर अपना हक वापस लें। इसी अभियान को बाद में “धान काटो आंदोलन” के नाम से जाना गया।
इस आंदोलन के दौरान कई जगह महाजनों और आदिवासियों के बीच संघर्ष हुए। प्रशासन का आरोप था कि आंदोलन के कारण कानून-व्यवस्था प्रभावित हो रही है, जबकि शिबू सोरेन इसे आदिवासियों को उनका हक दिलाने की लड़ाई बताते थे।

क्या सचमुच जारी हुआ था Shoot-at-Sight आदेश?

झारखंड आंदोलन के कई वरिष्ठ नेताओं, राजनीतिक लेखों और संस्मरणों में यह दावा मिलता है कि तत्कालीन बिहार सरकार ने शिबू सोरेन को पकड़ने के लिए बेहद सख्त कदम उठाए थे। कई लेखों में यह उल्लेख मिलता है कि पुलिस और प्रशासन को उन्हें देखते ही गोली मारने तक के निर्देश दिए गए थे।
हालांकि महत्वपूर्ण बात यह है कि आज तक ऐसी किसी आधिकारिक सरकारी अधिसूचना (Notification) या आदेश की प्रमाणित प्रति सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है। इसलिए इतिहासकार आमतौर पर इसे “कथित Shoot-at-Sight आदेश” या “Shoot-at-Sight की चर्चा” के रूप में उल्लेखित करते हैं।

तत्कालीन डीसी के.बी. सक्सेना की भूमिका

शिबू सोरेन के जीवन का यह अध्याय उस समय बदला जब धनबाद के तत्कालीन उपायुक्त (डीसी) K. B. Saxena ने स्थिति को अलग नजरिए से देखा।
के.बी. सक्सेना ने पाया कि शिबू सोरेन कोई साधारण अपराधी नहीं बल्कि आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ रहे जननेता हैं। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि शिबू सोरेन को खत्म करने के बजाय मुख्यधारा में लाया जाए।
कई विवरणों के अनुसार, सक्सेना ने शिबू सोरेन के खिलाफ चल रही कार्रवाई को नरम करवाने और उन्हें आत्मसमर्पण कर लोकतांत्रिक राजनीति में आने के लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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भूमिगत जीवन और पुलिस की तलाश

उस समय पुलिस लगातार शिबू सोरेन की तलाश कर रही थी। वे अक्सर जंगलों और ग्रामीण इलाकों में रहकर आंदोलन का संचालन करते थे।
झारखंड आंदोलन से जुड़े पुराने कार्यकर्ताओं के अनुसार:
• पुलिस छापेमारी लगातार होती थी।
• शिबू सोरेन कई बार स्थान बदलते थे।
• समर्थक उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाते थे।
• प्रशासन उन्हें “वांछित व्यक्ति” मानकर खोज रहा था।
इसी दौर ने उनकी छवि एक संघर्षशील आदिवासी नेता के रूप में मजबूत कर दी।

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ए.के. राय ने कैसे दिया साथ?

जब प्रशासनिक दबाव बढ़ रहा था, तब A. K. Roy खुलकर शिबू सोरेन के समर्थन में सामने आए।
ए.के. राय का मानना था कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि जमीन, शोषण और सामाजिक न्याय का सवाल है। उन्होंने मजदूर आंदोलन और आदिवासी आंदोलन को एक मंच पर लाने की कोशिश की।
बाद में ए.के. राय, शिबू सोरेन और Binod Bihari Mahato ने मिलकर 1972 में Jharkhand Mukti Morcha की स्थापना की, जिसने अलग झारखंड राज्य आंदोलन को नई ताकत दी।

इतिहासकार क्या कहते हैं?

इतिहासकारों और शोधकर्ताओं की राय है कि “Shoot-at-Sight” प्रसंग शिबू सोरेन के संघर्ष की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक स्मृति है, लेकिन इसे आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों से पूरी तरह प्रमाणित नहीं किया जा सका है।
फिर भी यह निर्विवाद है कि:
• शिबू सोरेन उस दौर में बिहार सरकार के सबसे अधिक वांछित आंदोलनकारी नेताओं में थे।
• उनके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज थे।
• वे लंबे समय तक भूमिगत रहे।
• प्रशासन उन्हें गिरफ्तार करने के लिए व्यापक अभियान चला रहा था।
• बाद में वही नेता लोकतांत्रिक राजनीति के जरिए झारखंड आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरा।
यही वजह है कि शिबू सोरेन की जीवनी में “Shoot-at-Sight से मुख्यमंत्री तक” की कहानी आज भी झारखंड की राजनीति का सबसे चर्चित अध्याय मानी जाती है।

ये भी देखें: पेपर लीक का दोषी टेलीग्राम था… या सिस्टम? | NEET Paper Leak Explained | NTA | Telegram Ban

Ritika Singh
Ritika Singh

कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।

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