इतिहास के दस्तावेजों में खोज — जब छोटानागपुर की मिट्टी ने पहली बार आज़ादी का रंग देखा
हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को झारखंड के हर गांव, कस्बे और शहर में तिरंगा फहराया जाता है। स्कूलों में परेड होती है, चौक-चौराहों पर झंडोत्तोलन होता है, और शाम होते-होते हर घर की छत पर तिरंगा लहराता नज़र आता है। लेकिन इस बरसों पुरानी परंपरा की जड़ें कहां से शुरू हुईं, यह बहुत कम लोग जानते हैं। सवाल सुनने में जितना आसान लगता है — “झारखंड में पहली बार तिरंगा कब फहराया गया?” — जवाब उतना सीधा नहीं निकलता। पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, स्वतंत्रता आंदोलन के अभिलेखों और स्थानीय स्रोतों को खंगालने पर पता चलता है कि यह कहानी किसी एक दिन या एक जगह की नहीं, बल्कि करीब ढाई दशक तक फैली एक पूरी यात्रा की है — जो 1920 के दशक के झंडा सत्याग्रह से शुरू होकर, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से होते हुए, आख़िरकार 1947 की आज़ादी की उस रात पर जाकर पूरी होती है, जब रांची की एक पहाड़ी पर पहली बार आज़ाद भारत का तिरंगा फहराया गया। इस पड़ताल को समझने के लिए एक बात शुरू में ही साफ कर लेनी ज़रूरी है — आज जिस तिरंगे को हम जानते हैं, केसरिया-सफेद-हरे रंग में अशोक चक्र वाला ध्वज, उसे संविधान सभा ने आज़ादी मिलने से ठीक कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को अपनाया था। उससे पहले के लंबे संघर्ष के दौरान देश जिस झंडे के लिए लड़ रहा था, वह चरखे वाला स्वराज ध्वज था। झारखंड यानी तत्कालीन छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्र का इतिहास इन दोनों झंडों से गहराई से जुड़ा है — और यही वजह है कि “पहली बार तिरंगा कब फहरा” के सवाल का जवाब एक नहीं, कई परतों में मिलता है।पहली परत: 1923 का झंडा सत्याग्रह — जब झंडा फहराना ही अपराध था
कहानी की शुरुआत वहां से होती है, जहां अंग्रेज़ सरकार ने भारतीयों को राष्ट्रीय झंडा फहराने के अधिकार से ही वंचित कर दिया था। 1923 में नागपुर और जबलपुर से शुरू हुआ “झंडा सत्याग्रह” जल्द ही देश के कोने-कोने तक फैल गया। यह कोई हथियारबंद विद्रोह नहीं था, बल्कि गांधीजी की अगुवाई वाली सविनय अवज्ञा की उसी परंपरा का हिस्सा था, जिसमें लोग जानबूझकर झंडा फहराकर गिरफ्तारी देते थे — सिर्फ यह साबित करने के लिए कि झंडा फहराना अपराध नहीं, अधिकार है। यह आंदोलन आगे चलकर असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन तक हर बड़े जन-आंदोलन का एक स्थायी हिस्सा बन गया। हर बार जब भी कांग्रेस ने कोई बड़ा आंदोलन छेड़ा, झंडा फहराना उसका सबसे ताकतवर और सबसे खतरनाक प्रतीक बना — क्योंकि झंडा फहराते ही गिरफ्तारी लगभग तय होती थी। छोटानागपुर का इलाका भी इस लहर से अछूता नहीं रहा, और आगे चलकर यहां के सेनानियों ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।दूसरी परत: 26 जनवरी 1930 — जब छोटानागपुर ने पहली बार सामूहिक रूप से झंडा फहराया
दिसंबर 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन में, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ। इसी अधिवेशन में तय हुआ कि हर साल 26 जनवरी को पूरे देश में “स्वाधीनता दिवस” के रूप में मनाया जाएगा — यह वही तारीख है, जो बीस साल बाद संविधान लागू होने के दिन गणतंत्र दिवस के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। 26 जनवरी 1930 को जब देश भर में यह दिन मनाया गया, तो छोटानागपुर भी उत्साह से भर उठा। इसके आयोजक स्थानीय संगठन ‘तरुण संघ’ था, जिसने रांची में झंडा फहराने के साथ-साथ स्वाधीनता दिवस के कार्यक्रम को सफलतापूर्वक आयोजित किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग भी शामिल हुए, जो इस बात का साक्षी है कि झारखंड की स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू से ही शहरी मध्यवर्ग तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें आदिवासी समाज की भी गहरी भागीदारी थी। इसी दिन का एक और दिलचस्प और साहसिक प्रसंग हजारीबाग से जुड़ा है। यहां युवा नेता कृष्ण बल्लभ सहाय ने पुलिस की लाठियां खाते हुए भी हजारीबाग कचहरी परिसर पर झंडा फहरा दिया। यह कोई प्रतीकात्मक विरोध नहीं था — कचहरी परिसर औपनिवेशिक सत्ता का सीधा प्रतीक था, और वहां झंडा फहराना ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती देने जैसा था। आगे चलकर कृष्ण बल्लभ सहाय बिहार की राजनीति में एक बड़ा नाम बने, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा की यह शुरुआती और सबसे साहसी तस्वीरों में से एक है। इसके कुछ महीनों बाद जब सविनय अवज्ञा आंदोलन और आगे बढ़ा, तो झारखंड के मोहन महतो, सहदेव महतो, गणेश महतो और गोकुल महतो ने नमक सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी निभाई। इसी दौर में संथाल आदिवासी समुदाय ने भी आंदोलन में अपनी छाप छोड़ी — गोमिया थाना क्षेत्र के बोरोगेरा गांव के बंगम माणे ने संथालों के आंदोलन का नेतृत्व किया। सितंबर 1930 में रांची में “स्वदेशी सप्ताह” मनाया गया, और नवंबर 1930 में पूरे इलाके में “जवाहर सप्ताह” के तहत कार्यक्रम आयोजित हुए। यानी अगर सवाल यह है कि झारखंड में संगठित रूप से झंडा फहराने और स्वाधीनता दिवस मनाने की परंपरा कब शुरू हुई, तो उसका जवाब 26 जनवरी 1930 के आसपास मिलता है — हालांकि उस समय जो झंडा फहराया गया, वह स्वराज ध्वज था, आज का तिरंगा नहीं।तीसरी परत: 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन — जब झारखंड ने खुलकर बगावत की
अगर 1930 का दौर झंडे के अधिकार की लड़ाई का था, तो 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन झारखंड के लिए सीधी बगावत का दौर साबित हुआ। 8 अगस्त 1942 को मुंबई में जब कांग्रेस ने “भारत छोड़ो” प्रस्ताव पारित किया और गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया, तो अगले ही दिन इसकी आग झारखंड तक पहुंच गई। इस आंदोलन की सबसे मार्मिक और कम चर्चित कहानियों में से एक हजारीबाग जिले के केरेडारी की है। यहां के आनंदी साव नाम के एक स्वतंत्रता सेनानी ने बड़कागांव के अपने साथियों प्रयाग रविदास और प्रकाल रविदास के साथ मिलकर तिरंगा लहराते हुए हजारीबाग समाहरणालय (कलेक्टर कार्यालय) तक मार्च किया और वहां झंडा फहराकर अंग्रेज़ी हुकूमत को सीधी चुनौती दी। नतीजा वही हुआ जो उस दौर में तय था — अंग्रेज़ों ने आनंदी साव और उनके साथियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। आनंदी साव की कहानी और भी दिलचस्प इसलिए है क्योंकि उनका जुड़ाव सीधे महात्मा गांधी से रहा। 18 सितंबर 1925 को जब गांधीजी पहली बार हजारीबाग के दौरे पर आए थे, तो उन्होंने आनंदी साव और उनके साथियों के साथ जिले के गांवों का दौरा किया था और ग्रामीणों को चरखा चलाने के लिए प्रेरित किया था। 1930 में गांधीजी दोबारा हजारीबाग आए और फिर आनंदी साव व उनके साथियों से गांवों की गतिविधियों की जानकारी ली। यानी जिस व्यक्ति ने 1942 में हजारीबाग समाहरणालय पर तिरंगा फहराया, वह गांधीजी से सीधे प्रभावित और उनके संपर्क में रहा एक जन-कार्यकर्ता था — कोई अचानक उभरा आंदोलनकारी नहीं। बताया जाता है कि आनंदी साव सादे कपड़ों में रहते हुए भी हमेशा अपने पास एक तिरंगा साथ रखते थे। उनका निधन वर्ष 2002 में, 104 साल की उम्र में हुआ। इसी दौर में झारखंड के अलग-अलग हिस्सों में विरोध की लहर तेज़ी से फैली। जमशेदपुर (टाटा नगर) में 30 अगस्त 1942 को आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसके विरोध में पूरा शहर हड़ताल पर चला गया। इसी शहर में रामानंद तिवारी के नेतृत्व में पुलिसकर्मियों ने ही विद्रोह कर दिया, जिसके बाद करीब 33 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेजा गया। चक्रधरपुर और चाईबासा (आज के कोल्हान क्षेत्र) में भी बड़े पैमाने पर हड़तालें हुईं। आंदोलन के दौरान हजारीबाग सेंट्रल जेल राजनीतिक बंदियों के लिए एक बड़ा केंद्र बन गया था। इसी जेल में जयप्रकाश नारायण को रखा गया था, जो 9 नवंबर 1942 को अपने पांच साथियों — रामानंद मिश्र, योगेंद्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह, गुलाबी सोनार और शालिग्राम सिंह — के साथ जेल की दीवार फांदकर फरार हो गए थे। यह घटना स्वतंत्रता संग्राम के सबसे साहसी और चर्चित जेलब्रेक प्रसंगों में गिनी जाती है। भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ी झारखंड की आख़िरी दर्ज गिरफ्तारी रांची में 22 अगस्त 1943 को हुई, जब वाचस्पति त्रिपाठी को गिरफ्तार किया गया। यह पूरा दौर दिखाता है कि 1942 आते-आते झारखंड सिर्फ झंडा फहराने के प्रतीकात्मक विरोध से आगे बढ़कर सीधे टकराव, गोलीबारी, पुलिस विद्रोह और जेलब्रेक तक पहुंच चुका था। तिरंगा अब सिर्फ एक प्रतीक नहीं, बल्कि खुली बगावत का हथियार बन चुका था।चौथी परत: आज़ादी की रात, रांची का पहाड़ी मंदिर
अब बात उस सवाल की, जिसका जवाब सबसे ज़्यादा लोग जानना चाहते हैं — आज़ाद भारत के मौजूदा तिरंगे के डिज़ाइन में झारखंड में पहली बार झंडा कब फहराया गया? इसका जवाब मिलता है 14-15 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक रात में, और इसकी गवाही खुद रांची शहर के बीचोंबीच बसा पहाड़ी मंदिर देता है। पहाड़ी पर बना यह शिव मंदिर पहले “तिरीबुरू” कहलाता था। लेकिन अंग्रेज़ी शासनकाल में इसका नाम बदलकर “फांसी टुंगरी” पड़ गया — क्योंकि इसी पहाड़ी पर अंग्रेज़ स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दिया करते थे। यानी जिस जगह पर कभी आज़ादी के दीवानों को सूली पर चढ़ाया जाता था, उसी जगह ने आज़ादी की पहली सुबह देखी — यह इत्तेफ़ाक इतना गहरा है कि इतिहास खुद अपनी सबसे बड़ी कहानी लिखता नज़र आता है। मंदिर परिसर में आज भी लगे एक शिलालेख और स्थानीय विवरणों के अनुसार, आज़ादी मिलने के बाद रांची में सबसे पहला झंडा इसी पहाड़ी मंदिर पर फहराया गया था। 14 अगस्त 1947 की रात को जैसे ही पहाड़ी मंदिर पर तिरंगा फहराया गया, यह खबर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई। लोग ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस बनाकर पहाड़ी की ओर उमड़ पड़े और रातभर आज़ादी का जश्न मनाया। उस दौर में रांची की आबादी आज की तुलना में बेहद कम थी, फिर भी कहा जाता है कि लगभग हर घर से कोई न कोई इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने पहाड़ी पर ज़रूर पहुंचा। इसी रात से एक ऐसी परंपरा जन्मी, जो आज तक अनवरत चली आ रही है — हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को पहाड़ी मंदिर पर तिरंगा फहराने की रस्म बिना रुके जारी है। यही वजह है कि पहाड़ी मंदिर को झारखंड ही नहीं, देश के उन गिने-चुने धार्मिक स्थलों में गिना जाता है, जहां आज़ादी के तुरंत बाद राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था।तो आख़िर पहली बार तिरंगा कब फहरा — 1930, 1942 या 1947?
इस पूरी पड़ताल के बाद तस्वीर कुछ इस तरह साफ होती है, और यही इस सवाल का सबसे ईमानदार जवाब भी है: • स्वतंत्रता संग्राम के दौर के झंडे की बात करें तो — झारखंड (तत्कालीन छोटानागपुर) में झंडा फहराने और स्वाधीनता दिवस मनाने का सबसे पुराना दर्ज सामूहिक प्रसंग 26 जनवरी 1930 का है, जब रांची के तरुण संघ और हजारीबाग में कृष्ण बल्लभ सहाय जैसे सेनानियों ने ब्रिटिश पाबंदियों को धता बताते हुए झंडा फहराया। • खुली बगावत और सीधे टकराव के प्रतीक के तौर पर — 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हजारीबाग के आनंदी साव द्वारा समाहरणालय पर फहराया गया तिरंगा झारखंड के प्रतिरोध की सबसे साहसी मिसालों में गिना जाता है। • आज़ाद भारत के मौजूदा तिरंगे की बात करें तो — रांची के पहाड़ी मंदिर पर 14-15 अगस्त 1947 की रात को फहराया गया झंडा शहर और राज्य के लिए पहला दर्ज प्रसंग माना जाता है। तीनों घटनाएं अपनी-अपनी जगह ऐतिहासिक हैं, और तीनों मिलकर यह साबित करती हैं कि झारखंड की धरती आज़ादी की लड़ाई में कभी मूकदर्शक नहीं रही — चाहे वह आदिवासी समुदायों का सविनय अवज्ञा आंदोलन में योगदान हो, हजारीबाग के एक साधारण से दिखने वाले किसान-कार्यकर्ता का समाहरणालय पर झंडा फहराना हो, या फांसी टुंगरी जैसी मौत की जगह का आज़ादी के जश्न की धरती में बदल जाना हो। आज जब हर 15 अगस्त को पहाड़ी मंदिर की चोटी पर तिरंगा लहराता है, तो वह सिर्फ एक सरकारी रस्म नहीं है — वह उस रात की याद है जब फांसी की जगह ने आज़ादी की पहली सुबह देखी थी, और उन गुमनाम सेनानियों की भी, जिन्होंने दो दशक पहले लाठियां खाकर, जेल जाकर और गोलियां सहकर इस दिन की नींव रखी थी।
विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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