कटहल के पेड़ के विवाद ने बदल दी जिंदगी की दिशा
मिसिर बेसरा के नक्सली बनने की कहानी के पीछे एक स्थानीय विवाद का भी जिक्र किया जाता है। बताया जाता है कि 1980 के दशक की शुरुआत में गांव में कटहल के एक पेड़ को लेकर हुए विवाद के दौरान उसने दबंगों का विरोध किया। इस घटना के बाद उसका झुकाव धीरे-धीरे उग्र वामपंथी विचारधारा की ओर बढ़ने लगा और वह मुख्यधारा के जीवन से दूर होता चला गया। इसके बाद उसने नक्सली विचारधारा से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों और बैठकों में भाग लेना शुरू किया, जिसने आगे चलकर उसे माओवादी संगठन से जोड़ दिया। वर्ष 1987 में उसने औपचारिक रूप से हथियार उठा लिए और नक्सली संगठन के सशस्त्र विंग का हिस्सा बन गया। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यही वह दौर था, जब मिसिर बेसरा ने संगठन के भीतर अपनी सक्रिय भूमिका की शुरुआत की और बाद में माओवादी नेतृत्व के शीर्ष स्तर तक पहुंच गया।
छात्र जीवन से शुरू हुआ नक्सल संगठन का सफर

कोलकाता से संभाली प्रचार और संगठन विस्तार की जिम्मेदारी
संगठन में उसकी सक्रियता लगातार बढ़ती गई। वर्ष 1990 में किशन दा ने उसे प्रेस संबंधी कार्य और संगठनात्मक जिम्मेदारियों के लिए कोलकाता भेजा। उस समय वह सब-जोनल स्तर का नेता था। वर्ष 1992 में लौटने के बाद उसने राजेश नामक संथाली साथी के साथ मिलकर रांची और आसपास के जिलों में संगठन के विस्तार और प्रचार-प्रसार का जिम्मा संभाला।झारखंड में नक्सली नेटवर्क खड़ा करने में निभाई अहम भूमिका
वर्ष 1997 में मिसिर बेसरा ने दक्षिणी छोटानागपुर कमेटी का गठन किया। इसके बाद वर्ष 2000 में झारखंड रीजनल कमेटी के गठन में भी उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी दौरान रांची के बुंडू क्षेत्र में ‘मितन’ नामक क्रियावादी के नेतृत्व में संगठन का पहला सशस्त्र दस्ता भी गठित कराया। संगठन में उसकी बढ़ती पकड़ को देखते हुए वर्ष 2003 में उसे केंद्रीय कमेटी का सदस्य बनाया गया। सितंबर 2004 में विभिन्न नक्सली संगठनों के विलय के बाद उसे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन तथा ईआरबी (ERB) के मिलिट्री कमांड की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद वह लंबे समय तक संगठन के शीर्ष नेतृत्व का अहम हिस्सा बना रहा।150 से अधिक मामलों में आरोपी, कई बड़ी वारदातों से जुड़ा नाम
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार मिसिर बेसरा का नाम कई बड़े नक्सली हमलों और हिंसक घटनाओं की रणनीति एवं संचालन से जुड़ा रहा। उसके खिलाफ झारखंड समेत विभिन्न राज्यों में हत्या, विस्फोट, पुलिस बलों पर हमले और अन्य गंभीर अपराधों के 150 से अधिक मामले दर्ज हैं।तकनीकी निगरानी के बाद सुरक्षा एजेंसियों के शिकंजे में आया
लगातार तकनीकी निगरानी, खुफिया सूचनाओं के विश्लेषण और झारखंड पुलिस तथा केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के संयुक्त अभियान के बाद आखिरकार उसे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के समय उसके साथ संगठन के केवल तीन सदस्य मौजूद थे और चारों के पास कोई हथियार नहीं था, जो संगठन की कमजोर होती स्थिति को भी दर्शाता है। ये भी पढ़ें: JPSC गड़बड़ी केस में जांच तेज, फिर CID के सामने पेश हुए पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्तेकंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।








