कोडरमा: कहते हैं कि सपनों की कोई कीमत नहीं होती, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। झारखंड के कोडरमा (झुमरी तिलैया) के रहने वाले सत्यम मोदी की कहानी इसी जज़्बे की मिसाल है। पिता गौशाला रोड पर एक छोटी राशन दुकान चलाते हैं और साथ ही चाय-नाश्ते का ठेला लगाकर परिवार का खर्च उठाते हैं। घर में संसाधन सीमित थे, लेकिन बेटे के सपनों पर कभी समझौता नहीं हुआ।
आज उसी मेहनत और परिवार के त्याग का नतीजा है कि सत्यम ने RE-NEET 2026 में 720 में से 640 अंक हासिल किए हैं। उन्होंने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 2321 और OBC-NCL कैटेगरी में 838वीं रैंक प्राप्त कर न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे कोडरमा और झारखंड का नाम रोशन कर दिया है।
पहली बार सफलता नहीं मिली, लेकिन हिम्मत भी नहीं टूटी
हर सफलता के पीछे एक संघर्ष छिपा होता है और सत्यम की कहानी भी इससे अलग नहीं है।
दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए राजस्थान के कोटा चले गए। साल 2025 में उन्होंने पहली बार NEET परीक्षा दी, लेकिन उनकी रैंक लगभग 36 हजार आई। यह परिणाम उनके सपनों के मुताबिक नहीं था।
कई छात्र यहां हार मान लेते हैं, लेकिन सत्यम ने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने अपनी कॉपियां दोबारा देखीं, मॉक टेस्ट का विश्लेषण किया, कमजोर विषयों पर ज्यादा समय दिया और पूरे आत्मविश्वास के साथ फिर से तैयारी शुरू कर दी। यही फैसला उनकी जिंदगी बदलने वाला साबित हुआ।
घंटों पढ़ने से ज्यादा जरूरी है सही तरीके से पढ़ना
सत्यम का मानना है कि सिर्फ किताब लेकर लंबे समय तक बैठे रहना ही मेहनत नहीं होती।
वे कहते हैं कि पढ़ाई का असली मतलब है किसी विषय को समझना, उसकी गलतियों को पहचानना और उन्हें सुधारना।
इसी सोच के साथ उन्होंने नियमित रूप से मॉक टेस्ट दिए। हर टेस्ट के बाद घंटों बैठकर यह समझा कि गलती कहां हुई और अगली बार उसे कैसे बेहतर किया जा सकता है।
कोचिंग के अलावा वे रोजाना लगभग 10 से 12 घंटे सेल्फ स्टडी करते थे। उनका पूरा फोकस कॉन्सेप्ट क्लियर करने और बार-बार रिवीजन करने पर रहता था।
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मोबाइल दुश्मन नहीं बना, पढ़ाई का साथी बना
आज के समय में अधिकांश छात्र सोशल मीडिया में काफी समय बिताते हैं, लेकिन सत्यम ने मोबाइल का इस्तेमाल अलग तरीके से किया।
उन्होंने YouTube का उपयोग केवल कठिन टॉपिक समझने के लिए किया। WhatsApp पर सिर्फ स्टडी ग्रुप्स और नोट्स शेयर किए जाते थे। पढ़ाई के अलावा उन्होंने सोशल मीडिया से लगभग दूरी बना ली थी।
उनका मानना है कि अगर मोबाइल सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो वही सबसे बड़ा शिक्षक भी बन सकता है।
तीन साल तक घर नहीं लौटे
सत्यम की कहानी का सबसे भावुक पहलू उनका समर्पण है।
कोटा जाने के बाद वे पूरे तीन वर्षों तक एक बार भी अपने घर नहीं लौटे।
इस दौरान परिवार में शादियां हुईं, त्योहार आए, रिश्तेदारों के कार्यक्रम हुए, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य को सबसे ऊपर रखा।
घर की याद जरूर आती थी, लेकिन हर बार वे खुद को यही समझाते थे कि आज का त्याग ही कल उनके परिवार की खुशियों की वजह बनेगा।
पिता की मेहनत को बनाया अपनी ताकत
सत्यम बताते हैं कि जब भी पढ़ाई के दौरान थकान महसूस होती थी तो उन्हें अपने पिता की मेहनत याद आती थी।
सुबह से देर रात तक दुकान और चाय-नाश्ते के ठेले पर काम करते पिता को देखकर उन्होंने तय कर लिया था कि उनकी मेहनत कभी बेकार नहीं जाने देंगे।
यही सोच उन्हें हर दिन पहले से ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित करती रही।
अब AIIMS में पढ़ने का सपना
RE-NEET 2026 में शानदार प्रदर्शन के बाद सत्यम को उम्मीद है कि उन्हें AIIMS Patna या AIIMS Deoghar में MBBS की सीट मिल सकती है।
उनका सपना सिर्फ डॉक्टर बनना नहीं है, बल्कि ऐसे डॉक्टर बनना है जो जरूरतमंद लोगों की सेवा कर सके और अपने माता-पिता के संघर्ष को सफल बना सके।
आज सोशल मीडिया पर अक्सर सफलता की खबरें दिखाई देती हैं, लेकिन सत्यम मोदी की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि इसमें सिर्फ अच्छे अंक नहीं हैं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन, धैर्य और परिवार का त्याग भी है।
एक छोटे से ठेले पर चाय बेचने वाले पिता का बेटा आज देश के हजारों मेडिकल अभ्यर्थियों के बीच अपनी जगह बना चुका है। यह कहानी हर उस छात्र के लिए उम्मीद की किरण है जो आर्थिक परेशानियों के कारण अपने सपनों को छोटा मानने लगता है।
सत्यम ने साबित कर दिया कि सफलता किसी की पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं देखती। वह सिर्फ मेहनत, सही दिशा और लगातार प्रयास करने वालों के साथ खड़ी होती है।
एक नजर में सत्यम मोदी की उपलब्धि
- नाम: सत्यम मोदी
- निवास: झुमरी तिलैया, कोडरमा (झारखंड)
- परीक्षा: RE-NEET 2026
- प्राप्त अंक: 640/720
- ऑल इंडिया रैंक: 2321
- OBC-NCL रैंक: 838
- पिता: संतोष मोदी
- पारिवारिक व्यवसाय: राशन दुकान और चाय-नाश्ते का ठेला
- तैयारी: कोटा, राजस्थान
- लक्ष्य: AIIMS Patna या AIIMS Deoghar से MBBS
यह सिर्फ एक छात्र की सफलता नहीं, बल्कि उस हर परिवार की जीत है जो सीमित साधनों के बावजूद अपने बच्चों के सपनों को उड़ान देने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। सत्यम मोदी की कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह भरोसा दिलाती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल एक दिन जरूर मिलती है।
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