Jharkhand में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य सरकार और पुलिस की ओर से महिला सुरक्षा के लिए कई तकनीकी और प्रशासनिक पहलें की गई हैं, लेकिन अपराध के आंकड़े और जमीनी स्थिति कई चुनौतियों की ओर इशारा करते हैं। खासकर राजधानी रांची में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जबकि इनके विस्तृत सरकारी आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
पिछले छह महीनों के दौरान झारखंड में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की स्थिति का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि दुष्कर्म, अपहरण और दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। दूसरी ओर, महिलाओं की सुरक्षा के लिए शुरू किए गए ‘शक्ति’ मोबाइल ऐप और रांची के प्रमुख चौक-चौराहों पर लगाए गए इमरजेंसी कॉल बॉक्स भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं।
रांची में छेड़छाड़ के मामलों की पूरी तस्वीर क्यों नहीं मिल रही?
रांची पुलिस की मासिक अपराध रिपोर्टों में छेड़छाड़ या मोलेस्टेशन के मामलों को अलग श्रेणी में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया जाता। इसी कारण पिछले कुछ महीनों में राजधानी में महिलाओं और छात्राओं के साथ हुई ऐसी घटनाओं की समग्र संख्या स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हो पाती।
हालांकि विभिन्न इलाकों से समय-समय पर छात्राओं और युवतियों के साथ अभद्र व्यवहार, पीछा करने और उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतें सामने आती रही हैं। इनमें लालपुर, कांके, नामकुम समेत अन्य क्षेत्रों के मामले भी शामिल हैं। लेकिन अलग-अलग घटनाओं के आधार पर शहर की कुल स्थिति का व्यापक आकलन करना कठिन माना जाता है।
महिला सुरक्षा से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि छेड़छाड़, स्टॉकिंग, साइबर उत्पीड़न और घरेलू हिंसा जैसी श्रेणियों के आंकड़े नियमित रूप से अलग-अलग जारी किए जाएं, तो महिला सुरक्षा से जुड़ी स्थिति को अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
मार्च 2026 में झारखंड में दर्ज हुए 138 दुष्कर्म और 185 अपहरण के मामले
झारखंड पुलिस के उपलब्ध अपराध आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 में पूरे राज्य में:
* 138 दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए।
* 185 अपहरण के मामले दर्ज हुए।
* 18 दहेज हत्या के मामले दर्ज हुए।
* 3 डायन हत्या की घटनाएं दर्ज हुईं।
इसी अवधि में रांची जिले में 21 दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए।
ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों की संख्या अब भी चिंताजनक स्तर पर बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है क्योंकि कई मामलों में शिकायत दर्ज ही नहीं हो पाती।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की चुनौतियां अलग
Jharkhand के ग्रामीण क्षेत्रों में डायन प्रथा, बाल विवाह और सामाजिक कुरीतियां महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में छेड़छाड़, साइबर अपराध, पीछा करना और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की असुरक्षा प्रमुख समस्याएं हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़ों की पारदर्शिता नहीं होने से नीति निर्माण और अपराध नियंत्रण की रणनीति प्रभावित होती है।
2015 में लॉन्च हुआ था ‘शक्ति’ ऐप, लेकिन उपयोग बेहद सीमित
महिलाओं को आपात स्थिति में तत्काल सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से झारखंड पुलिस ने 8 सितंबर 2015 को ‘शक्ति’ मोबाइल एप्लिकेशन लॉन्च किया था।
इस ऐप की प्रमुख विशेषताएं हैं:
- एक क्लिक पर SOS अलर्ट
- GPS लोकेशन शेयरिंग
- पुलिस कंट्रोल रूम को सीधी सूचना
- परिवार और मित्रों को अलर्ट भेजने की सुविधा
- नजदीकी पुलिस स्टेशन की जानकारी
हालांकि इतने महत्वपूर्ण फीचर्स होने के बावजूद ऐप का उपयोग बेहद सीमित रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार राज्य की लाखों महिलाओं में केवल करीब 10 हजार उपयोगकर्ता ही इससे जुड़े। Google Play Store पर भी इसके डाउनलोड अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐप के प्रति जागरूकता की कमी, प्रचार-प्रसार का अभाव और नियमित मॉनिटरिंग न होने के कारण यह पहल अपनी पूरी क्षमता के अनुसार प्रभाव नहीं दिखा सकी।
रांची के इमरजेंसी कॉल बॉक्स: सुरक्षा का भरोसा या सिर्फ दिखावा?
महिलाओं और आम नागरिकों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए रांची स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत राजधानी के प्रमुख चौक-चौराहों पर अत्याधुनिक इमरजेंसी कॉल बॉक्स लगाए गए थे।
इन कॉल बॉक्सों को हरमू चौक, बिरसा चौक, सुजाता चौक, मेकॉन चौक, कोकर चौक, रिंग रोड, ओवरब्रिज और कई अन्य प्रमुख स्थानों पर स्थापित किया गया।
इनकी विशेषता यह थी कि किसी भी आपात स्थिति में व्यक्ति केवल लाल बटन दबाकर सीधे कंट्रोल रूम से संपर्क कर सकता था।
योजना का उद्देश्य था:
* महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना
* सड़क दुर्घटना की तत्काल सूचना देना
* छेड़छाड़, मारपीट और अपराध की घटनाओं की रिपोर्टिंग आसान बनाना
* पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना
लेकिन समय के साथ इन कॉल बॉक्सों के रखरखाव को लेकर सवाल उठने लगे। कई स्थानों पर उपकरणों के खराब होने, बिजली की समस्या और तकनीकी खामियों की शिकायतें सामने आईं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि वर्षों में इनका उपयोग बेहद कम हुआ।
सबसे बड़ी समस्या: डेटा की पारदर्शिता का अभाव
महिला सुरक्षा के मुद्दे पर सबसे गंभीर समस्या आंकड़ों की अनुपलब्धता है।
आज भी निम्न अपराध श्रेणियों के नियमित और विस्तृत सरकारी आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं:
* छेड़छाड़ (Molestation)
* घरेलू हिंसा
* साइबर उत्पीड़न
* स्टॉकिंग
* सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ अभद्रता
जब तक इन अपराधों के विस्तृत आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक समस्या की गंभीरता का सही आकलन और प्रभावी समाधान दोनों कठिन रहेंगे।
क्या किए जाने चाहिए सुधार?
महिला सुरक्षा को प्रभावी बनाने के लिए विशेषज्ञ निम्न सुझाव दे रहे हैं:
1. अपराध आंकड़ों की सार्वजनिक रिपोर्टिंग
हर महीने महिला अपराधों की अलग श्रेणीवार रिपोर्ट जारी की जाए।
2. शक्ति ऐप का पुनर्प्रचार
कॉलेजों, स्कूलों और पंचायत स्तर तक अभियान चलाकर महिलाओं को ऐप के उपयोग के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
3. इमरजेंसी कॉल बॉक्स की ऑडिटिंग
सभी कॉल बॉक्स की तकनीकी जांच और नियमित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
4. साइबर अपराध पर विशेष निगरानी
महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे ऑनलाइन उत्पीड़न और ब्लैकमेलिंग के मामलों के लिए अलग सेल को मजबूत किया जाए।
5. सामुदायिक जागरूकता अभियान
छेड़छाड़, घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों के खिलाफ व्यापक जनजागरण अभियान चलाए जाएं।
Jharkhand में महिला सुरक्षा को लेकर तस्वीर मिश्रित दिखाई देती है। एक ओर सरकार ने शक्ति ऐप और इमरजेंसी कॉल बॉक्स जैसी तकनीकी पहलें शुरू कीं, वहीं दूसरी ओर अपराधों के आंकड़ों की पारदर्शिता और इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल बने हुए हैं।
दुष्कर्म, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अन्य अपराधों के आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं। ऐसे में केवल नई योजनाएं शुरू करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनकी नियमित निगरानी, जवाबदेही और जमीनी प्रभाव का मूल्यांकन भी उतना ही जरूरी है। महिला सुरक्षा को लेकर सरकार, पुलिस, समाज और तकनीकी तंत्र को मिलकर अधिक प्रभावी और पारदर्शी व्यवस्था विकसित करनी होगी।








