Ranchi: आजादी की लड़ाई में यूं तो अनेकों स्वंतत्रता सेनानियों ने अपनी कुर्बानी दी है। लोग अक्सर जब भी आजादी की लड़ाई की बात करते हैं तो सबसे बड़े नामों में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोष और भगत सिंह जैसे कई नाम सबसे पहले लिए जाते हैं। इन सबके बीच कई नाम ऐसे भी हैं जिनकों शायद दुनिया नहीं जान पाई है। आजादी की लड़ाई में झारखंड के कई स्वंतत्रता सेनानी शहीद हुए पर शायद ही आपको पता होगा कि झारखंड का एक ऐसा भी गांव हैं जहां एक दो नहीं बल्कि कई लोगों ने अपनी कुर्बानी दी थी। इस गांव को लोग अक्सर मतवालों को गांव कहते हैं क्योंकि यहां एक साथ 17 स्वंतत्रता सेनानी शहीद हुए थे।
हम बात कर रहे हैं झारखंड के हजारीबाग जिले के कटकमसांडी प्रखंड का पबरा गांव का जो स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भागीदारी के कारण खास पहचान रखता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, गांव के 17 लोगों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था और अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया था।
आज भी गांव के इतिहास की याद दिलाता है लगा पट्ट
पबरा पंचायत सचिवालय में इन स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर लगा पट्ट आज भी गांव के इतिहास की याद दिलाता है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इन सेनानियों ने महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर गांधीवादी तरीके से अंग्रेजी शासन का विरोध किया था। गांव के स्वतंत्रता सेनानियों में स्वर्गीय बालदेव महतो, बैजनाथ महतो, बंशी महतो, किशोरी नंदन महतो, रामेश्वर महतो, वज्जिर महतो, नामधारी महतो, गणपत महतो, कंचन महतो, टेकलाल महतो, बढ़न महतो, प्रमेश्वर दयाल महतो, रूपलाल महतो, बचन महतो, गौरी महतो और चेतलाल महतो के नाम स्थानीय स्तर पर दर्ज बताए जाते हैं। उपलब्ध विवरण में बचन महतो का नाम दो बार आता है।बक्सर जेल में ही हुई थी कंचन महतो की मौत
स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत बालदेव महतो के परिजन और सेवानिवृत्त शिक्षक शिवकुमार महतो के अनुसार, गांव के सभी 17 स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजों ने जेल भेजा था। इनमें बंशी महतो और कंचन महतो बक्सर जेल में बंद रहे। कंचन महतो की मौत बक्सर जेल में ही हुई थी। शिवकुमार महतो बताते हैं कि कुछ स्वतंत्रता सेनानियों को करीब एक साल तक जेल में रहना पड़ा। उनके मुताबिक, गांव में उस दौर में आपसी एकजुटता मजबूत थी। जब बालदेव महतो ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई, तो दूसरे लोग भी उनके साथ खड़े हुए। इसी वजह से पबरा को स्थानीय लोग आज भी आजादी के मतवालों का गांव कहते हैं।किसी मंदिर से कम नहीं है पबरा गांव
स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत बैजनाथ महतो के वंशज आशीष कुमार कहते हैं कि उनके लिए पबरा गांव किसी मंदिर से कम नहीं है। पंचायत भवन में स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में लगाया गया पट्ट नई पीढ़ी को उनके योगदान की याद दिलाता है। गांव में 15 अगस्त और 26 जनवरी को विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दी जाती है। स्वर्गीय बंशी महतो की बहू रेखा रानी भी अपने परिवार की विरासत पर गर्व जताती हैं। उनका कहना है कि पूर्वजों से मिली जानकारी अब परिवार के बच्चों तक पहुंचाई जा रही है, ताकि वे जान सकें कि उनके बुजुर्गों ने देश की सेवा को कितना महत्व दिया था। वह चाहती हैं कि आज की युवा पीढ़ी भी देश सेवा के लिए आगे आए।अपने गांव के इतिहास पर गर्व है, लेकिन विकास पर चिंता
स्वतंत्रता सेनानी के वंशज ईश्वर प्रसाद महतो को अपने गांव के इतिहास पर गर्व है, लेकिन गांव के विकास को लेकर उनकी चिंता भी है। उनका कहना है कि जिस गांव ने देश को स्वतंत्रता सेनानी दिए, वहां बुनियादी विकास पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, गांव की सड़क की स्थिति खराब है। वह चाहते हैं कि सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधि सड़क निर्माण पर ध्यान दें। साथ ही सभी स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनी को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की व्यवस्था हो, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने गांव के इतिहास और उन लोगों के संघर्ष को जान सकें। पबरा की पहचान केवल एक गांव के तौर पर नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की स्थानीय विरासत के रूप में बनी हुई है। आज भी यहां के परिवार अपने पूर्वजों के संघर्ष को गर्व के साथ याद करते हैं और उनकी कहानी अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
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