131st Constitutional Amendment Bill: सरकार की बड़ी विधायी विफलता; अब 2034 तक टला महिला आरक्षण?
131st Constitutional Amendment Bill: भारतीय संसदीय इतिहास में 24 साल बाद एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। मोदी सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने के लिए लाया गया ‘संविधान 131st Constitutional Amendment Bill (131वां संशोधन) विधेयक, 2026′ सदन में पास नहीं करा पाई। 12 साल के कार्यकाल में यह पहला मौका है जब सरकार का कोई बिल सदन में गिर गया है।
वोटिंग का पूरा गणित: क्यों गिरा बिल?
लोकसभा में इस बिल पर 21 घंटे की मैराथन चर्चा हुई, लेकिन जब वोटिंग की बारी आई, तो सरकार जरूरी आंकड़ा नहीं छू सकी।वोटिंग के दौरान सदन में कुल 528 सांसद उपस्थित थे, जिनमें से 298 ने बिल के पक्ष में और 230 ने इसके विरोध में अपना मत दिया। चूँकि यह एक संवैधानिक संशोधन था, इसलिए इसे पारित करने के लिए उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य आवश्यकता थी। गणितीय रूप से 528 सांसदों का दो-तिहाई बहुमत 352 वोट होता है, लेकिन सरकार केवल 298 वोट ही जुटा सकी। परिणामस्वरूप, यह महत्वपूर्ण विधेयक 54 वोटों की कमी के कारण गिर गया।
विशेष सत्र में पेश किए गए तीन मुख्य बिल
सरकार ने संसद के विशेष सत्र में तीन महत्वपूर्ण विधेयकों को चर्चा के लिए रखा था:
- संविधान (131st Constitutional Amendment Bill), 2026: लोकसभा सीटों को 850 करने का प्रस्ताव (राज्यों से 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35)।
- परिसीमन (संशोधन) विधेयक, 2026: परिसीमन के लिए ‘जनसंख्या’ की परिभाषा में बदलाव, ताकि 2011 की जनगणना को आधार बनाया जा सके।
- केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: पुडुचेरी, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के कानूनों में संशोधन, ताकि महिला आरक्षण लागू हो सके।
मुख्य बिल गिरने के बाद, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अन्य दो बिलों पर वोटिंग कराने से इनकार कर दिया, क्योंकि वे पहले बिल से ही जुड़े हुए थे।
दक्षिण भारत पर परिसीमन का प्रभाव
विपक्ष और विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता थी कि सीटों के बढ़ने से उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार परिसीमन के बाद भी दक्षिण भारत का हिस्सा 24% पर बरकरार रहता:
| राज्य | वर्तमान सीटें (543 में से) | वर्तमान हिस्सा (%) | परिसीमन के बाद सीटें (816 में से) | नया हिस्सा (%) |
| कर्नाटक | 28 | 5.15% | 42 | 5.14% |
| आंध्र प्रदेश | 25 | 4.60% | 38 | 4.65% |
| तेलंगाना | 17 | 3.13% | 26 | 3.18% |
| तमिलनाडु | 39 | 7.18% | 59 | 7.23% |
| केरल | 20 | 3.68% | 30 | 3.67% |
| कुल (दक्षिण) | 129 | 24% | 195 | 24% |
अब क्या होगा? महिला आरक्षण पर असर
इस बिल के गिरने का सबसे बड़ा असर महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पर पड़ेगा। अब नई जनगणना के नतीजे आने से पहले महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाएगा। इसका सीधा मतलब है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। अनुमान है कि अब यह प्रक्रिया 2034 तक खिंच सकती है।
इतिहास के पन्नों में यह हार
यह 2002 के ‘पोटा’ (आतंकवाद निवारण बिल) के बाद पराजित होने वाला पहला सरकारी विधेयक है। साथ ही, 1990 के बाद यह पहली बार है जब कोई ‘संविधान संशोधन विधेयक’ लोकसभा में गिरा है।













